मूलतः भोजपुिरया हूं। राजा भोज के भोजपुर की जुबान,रहन-सहन और उसकी लोक संस्कृित ने गहरे तक पऱभािवत िकया है। बचपन से पटना में रहने और पढ़ाई-िलखाई करने के बाद भी गांव की गिलयां,अाहर-पोखर,नदी-नाले,बाग-बागीचे और खेत-खिलहान कही ज्यादा अाकिषॆत करते रहे हैं। गमीॆ और सदीॆ की छुिट्टयों में नदी-तालाब में बंसी से मछली मारने और एयरगन से िचिड़यों का िशकार करने का नशा अाज भी िसर चढ़कर बोलता है। यही कारण है िक गांव जाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देता।
महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक पतरकािरता की है। िपछले अाठ साल से रांची में एक ही अखबार में जमा हूं। िफलवक्त दैिनक िहन्दुस्तान में उप समाचार संपादक की िजम्मेवारी िनबाह रहा हूं। िबहार के मैदान से झारखंड के जंगल-पहाड़ में पड़ाव डालने से पहले िदल्ली की िसयासत और मुंबई की माया का भी मुरीद रहा हूं।
झारखंड का लैंडस्केप कश्मीर की वािदयों की याद िदलाता है। यहां का िनश्छल अािदवासी समाज भले हमें िपछड़ा लगे, लेिकन उनकी कई खूिबयां खुद को सभ्य कहनेवालों को भी सोचने पर मजबूर करती हैं। एक इंटरव्यू में महाश्वेता देवी ने मुझसे कहा था- यह अािदवासी समाज ही है जहां कोई बच्चा अॉरफेन (लवािरस) नहीं होता। समाज उसे पाल लेता है। बहरहाल, कहने को बहुत कुछ है,िजसे समय-समय पर डाकघर में पोस्ट करता रहूंगा।