नक्सली समस्या के मूल में सोशल कॉिप्लकेशन नक्सली समस्या पर अब तक न मालूम िकतनी गोिष्ठयां और सेिमनारों के माध्यम से चचाॆ हो चुकी है, लेिकन अभी तक जड़ पर गंभीरता से िवमशॆ नहीं हुअा है। िविभन्न मंचों से नक्सली समस्या के मूल में गरीबी और अिशच्छा बताया जाता रहा है। अभी तक नक्सली समस्या िनवारण में भी बंदूक से अलग हट गरीबी और अिशच्छा को ही अाधार बनाकर कायॆयोजना बनायी जाती रही है। लेिकन नक्सली इलाके की हकीकत िजतना मैं समझ पाया हूं वह ऊपर के कारणों से अलहदा है। नक्सली उत्थान में इलाका िवशेष का सामािजक बुनावट िकसी भी अन्य कारण से बड़ा कारण रहा है। उसकी जड़ में गरीबी और अिशच्छा खाद-पानी जरूर देते हैं, लेिकन नक्सली समस्या के मूल में वह सोशल कॉिप्लकेशन ही है, िजसने कुछ लोगों को जान की बाजी लगाने को पऱेिरत िकया था। अव्वल तो नक्सली इलाके की कचोटने वाली सामािजक गैरबराबरी वह पहला कारण था, िजसमें पीिड़त और पऱतािड़त का िरश्ता नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका था। भूख और गरीबी से जूझना कभी उतनी बड़ी समस्या नहीं थी, िजतना अपने अात्म सम्मान को बचाना। हाड़तोड़ िजंदगी को अपना भाग्य मानने में से भी एक बड़े वगॆ को कभी गुरेज नहीं रहा है। लेिकन जब मामला सामािजक जीवन के ताने-बाने को तहस-नहस करने से जुड़ता रहा, तो अाग लगनी ही थी। अाग जलती रही, िकन्तु वह दवानल नहीं बन रहा था। अाग सुलगानेवाले भी जानते थे िक िजस सामािजक संरचना में वे हैं, वहां अाग लगाकर उसे तापना उनका काम है उसमें जलना नहीं। हर स्तर पर अपना मान मदॆन होता देखना और खून की घंूट पीकर जीवन काटना नक्सली इलाके के एक बड़े बगॆ की जमीनी सच्चाई थी। वे बाबुअों के खेत और घर में काम करते पीढ़ी दर पीढ़ी अपना जीवन गुजारते अाये थे। वे यह भी देखते रहे थे िक उनकी बहू-बेिटयों के साथ क्या कुछ िघनौना होता है। सामािजक िवसंगित, िवडंबना िवकृित का यह दंश झेलनेवाले अपने भीतर की अाग को कभी हवा देने की िस्थित में नहीं थे। नक्सली अांदोलन के नाम पर जब एेसे लोगों के सामने अपने अात्म सम्मान को बचाने के साथ पऱतािड़त करनेवालों को सबक िसखाने का मौका िमला, तो देखते-देखते नजारा बदलने लगा। |