सोमवार, 2 मार्च 2009

नक्सली समस्या कारणः २

नक्सली अांदोलन को पुिलस से भी िमला खाद-पानी

यह सुनने-जानने में अटपटा लग सकता है िक अपने दुश्मन नंबर एक नक्सिलयों के फलने-फूलने में पुिलस भी काफी हद तक सहायक रही है। शुरू में जब नक्सली िकसी गांव में वारदात करते थे, तो पुिलस गांव के उन सवॆहारा तबके को टारगेट करती थी, िजनपर मुखिबीरी का सुबहा होता था। दजॆनों लोगों को पकड़ा जाता था और हद तक उन्हें पऱतािड़त िकया जाता था। यह सब गांव के दबंगों के इशारे पर होता था। धीरे-धीरे हालत एेसी बनने लगी िक िकसी गांव में नक्सली कारॆवाई होते ही वहां का सवॆहारा वगॆ पुिलस के अाने के पहले ही घर-बार छोड़ भाग जाता था। नक्सिलयों के िलए यह मन मांगी मुराद जैसी होती थी। बाद में यही सवॆहारा नक्सिलयों के िलए इाका िवशेष में अाधार बनते गये। अाज भी एेसे हजारों लोग हैं, जो नक्सली गितिविध से िबना जुड़े़ पुिलस केस में फंसे हैं। इनमें से अिधकांश बाद में मरता क्या नहीं करता की तजॆ पर िकसी न िकसी रूप में नक्सिलयों से जुड़ते गये। इस तरह नक्सली अांदोलन का दायरा बढ़ता गया और वे हद तक बेकाबू भी बन गये। पुिलस के कुछ अफसर तब भी यह मानते थे िक नक्सिलयों के लोकल कनेक्शन असली मुसीबत हैं। पलामू में रहे एक एसपी ने मुझसे अॉन द िरकाडॆ कहा था गांवों में रहने वाले उनके सभी चौकीदार नक्सिलयों से िमले हैं। पुिलस की ९० फीसदी योजना की जानकारी उन्हें समय रहते िमल जाती है। बताते चलें िक लगभग सभी चौकीदार उस तबके से अाते हैं, िजनका दुराव गांव के बड़े लोगों से होता है। ये जहां गरीब होते हैं, वहीं सवॆहारा तबके से जुड़ाव महसूस करते हैं। बाकी बचे १० फीसदी चौकीदार की िस्थित सांप-छछूंदर जैसी होती है। पुिलस और नक्सिलयों के बीच तालमेल िबठाने में उनकी सांस फूली रहती है। अपने काम के पऱित वफादार चौकीदारों को नक्सिलयों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है। पऱत्येक वषॆ अाठ से दस चौकीदारों को नक्सली मुखिबरी के अारोप में मौत के घाट उतारते हैं।
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