शुक्रवार, 6 मार्च 2009

नक्सिलयों की रीित-नीित और उद्देश्य-२


महत्वपूणॆ पड़ाव होता है नक्सली अाकऱमण पर रोक की रणनीित


नक्सली रणनीितकार अाकऱमक कारॆवाइयों पर रोक और रच्छात्मक कारॆवाइयों पर जोर की रणनीित को दीघॆकालीन जनयुद्ध की राह में एक महत्वपूणॆ पड़ाव मानते हैं। वे मानते हैं िक एेसा नहीं होने पर अारंिभक जन उभार को बगावत समझ बैठने की गलतफहमी हो सकती है। इसिलए इस पड़ाव का उपयोग करते हुए नक्सली जनयुद्ध की दीघॆकालीन चिरतर की समझ को एकदम शुरू में ही िवशेष ध्यान देकर अपने अाधार वगॆ अात्मसात कराना जरूरी मानते हैं। यही वह समय होता है, जब राजसत्ता कठोर कारॆवाई के िलए तत्पर होता है। नक्सली रच्छात्मक कारॆवाई करते हैं। अाधार इलाके में पुिलस तथा अद्धॆसैिनक बलों की बूटों की धमक सुनाई पड़ने लगती है। हाडॆकोर नक्सली रच्छात्मक रणनीित के कारण उनकी पकड़ से दूर रहते हैं और समथॆक वगॆ दमन का िशकार बनता है। पुिलिसया दमन िजतना तीखा होता है समथॆक वगॆ का गुस्सा भी राजसत्ता के िखलाफ उतना ही भड़कता है। इस पऱिकऱया से नक्सली अांदोलन को मजबूती िमलने लगती है। इसे नक्सली रणनीितकार शानदार शुरूअाती सफलता मानते हैं। यही से शुरू होता है सुिनयोिजत रूप से जनसमुदायों को जनयुद्ध के िलए संगिठत करने और राजसत्ता के िखलाफ युद्ध जारी रखने के िलए पऱेिरत करने का काम। इसी मुकाम पर खुला तथा गुप्त गितिविधयों को तेज िकया जाता है। नक्सली रणनीितकार मान कर चलते हैं िक सरकार उनकी खुली गितिविधयों को बािधत करेगी और अमूमन एेसा होता भी है। इस िस्थित में खुली गितिविधयों को चलाने के िलए नक्सली चुहा-िबल्ली का खेल पऱशासन के साथ खेलते हैं। परिस्थित के अनुसार नये रूप और तरीके से गितिविधयों को जारी रखा जाता है। पऱयास यह होता है िक अगऱणी मानवािधकार संगठन और रसूखवाले नागिरक मानवािधकारों के हनन के िखलाफ खुलकर सामने अाये। दूसरी अोर जनजुड़ाव मजबूत करने की रणनीित के तहत जनअदालतों के माध्यम से सुलभ व त्विरत न्याय देना, भूिम और मजदूरी के सवाल पर लोगों को संगिठत करना, मेिडकल कैंप लगाना तथा सवॆहारा वगॆ से तादात्म स्थािपत करने का काम चलता रहता है। यही वो समय होता है जब सरकार नक्सिलयों को मुख्यधारा में वापस लाने की कसरत शुरू करती है। एक सवॆमान्य धारणा बनने लगती है िक नक्सली समस्या का समाधान सरकारी बंदूक नहीं बन सकती। मीिडया से लेकर पऱबुद्ध जन तक मानने लगते हैं िक नक्सली अांदोलन को खाद-पानी देनेवाले कारकों को खत्म करना होगा। भूिम िववादों का िनपटारा, सामंती सोच को बदलना, सवॆहारा को िवकास की मुख्यधारा से जोड़ने और बेरोजगारों को काम देना जैसी मूल समस्याअों की अोर शासन और पऱशासन का ध्यान जाता है। इसपर िकतना अमल होता है, यह अलग बहस का मुद्दा है, लेिकन नक्सली इसे भी एक अदद सरकारी षड़यंतर ही मानते हैं। इसी पड़ाव से शुरू होता है गुिरल्ला युद्ध के योजनाबद्ध िकऱयान्वयन का दौर।
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लच्छय पऱिप्त के िलए तय होती है अनुमािनत समय-सीमा

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