शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

वह नक्सली है

िपता जनतांतिरक,खुद नक्सली और बेटा पतरकार
नाम है िवजय अायाॆ। िबहार के गया िजले के गुरारू में उनका गांव है। काम भर पढ़ाई-िलखाई उसी इलाके में हुई। ९० के शुरुअाती िदन थेे। पढ़ने-िलखने के बाद भी नौकरी िमलना मुिश्कल था उन िदनों। सामान्य युवकों की तरह युवा अायाॆ भी अाकऱोिशत थे। अाकऱोश को बंदूक से व्यक्त करनेवाली पाटीॆ (गया से पलामू तक नक्सली दस्ते को पाटीॆवाला कहते हैं)एससीसी का पऱभाव छेतर गुरारू तक पहुंच चुका था। पढ़े-िलखे अायाॆ नक्सिलयों को काम के लगे। उन्हें नक्सली िलखाई-पढ़ाई के काम से जोड़ िदया गया। पऱेस नोट से लेकर पचाॆ,पोस्टर िलखने का काम अायाॆ को भाने लगा। उन्हें नक्सिलयों की फऱाॉटल संस्था जनपऱितरोध मंच का कामधाम देखने का िजम्मा िमला। पढ़ा-िलखा होने के कारण ये जल्द ही हाडॆकोर नेताअों के संपकॆ में अा गये। १९९४ में ये गया शहर से कमान संभालने लगे। यही वो समय था जब वे गया के पतरकारों के भी संपकॆ में अाये। शहर से नक्सली गितिविधयों की खबर िलखनेवालों के िलए वे नक्सली संगठन के पहले संपकॆसूतर बने।
ये ही वो शख्स थे,जो मगध छेतर में पहलीबार िपऱट और इलेक्टॉिनक मीिडया को नक्सली जनअदालत में ले गये थे। पहली बार पता चला िक अायाॆ जहां संवैधािनक व्यवस्था के िखलाफ बंदूक उठाने का िहमायती था,वहीं उसके िपता चुनाव लड़ने में िवश्वास रखते हैं। ( पूरा िववरण नक्सली जनअदालत में शीषॆक अालेख पढ़े)कुछ िदन पहले जमशेदपुर से होली मनाने रांची लौटते मेरे मोबाइल पर उनका कॉल अाया। बातें हुईं। उन्होंने बताया िक बेटा पतरकािरता कर रहा है। असेॆ बाद जेल से िनकले थे,लेिकन अाजाद नहीं थे। उन्होंने मुझे मोबाइल नहीं होने की बात कही। मेरा मोबाइल उनका लोकेशन यूपी में बता रहा था। पहचान छुपाने के िलए वे पिब्लक बूथ से बात कर रहे थे। बेटा अाजाद है। अलग बात है िक िपता नक्सली है। उगऱवादी गितिविधयों से अलग उसकी अपनी पहचान है।
बहरहाल,जब मैंने उनसे नक्सली गितिविधयों के संबंध में टोह ली,तो उन्होंने बताया िक झारखंड में जीतन मरांडी सशस्तर जनसेना की कमान संभाल रहे हैं। वे खुद िबहार-झारखंड में उसके ऊपरी संगठन की िजम्मेवारी देख रहे हैं।
जीतन मरांडी कौन है,मैं नहीं जानता।बस इतना जानता हूं िक जीतन मरांडी नाम झारखंड पुिलस को भी परेशान कर रही है।कुछ माह पहले पुिलस ने जीतन मरांडी को पकड़ा भी। खोज-बीन से पता चला िक वह जनवादी िवचारधारा का है और किव भी है। किव एेसा िक िमनटों में किवता गढ दे। साउथ छोटानागपुर की अांचिलक भाषा का जानकार है। उसके दो अालेख एक पऱितिष्ठत दैिनक के पहले पन्ने पर छपे थे।अंततः दिरयाफ्त कर पुिलस को उसे छोड़ना पड़ा। इसमें रांची के कऱाइम िरपोटॆरों की खबरों ने भी अहम भूिमका िनभायी।
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