बुधवार, 3 सितंबर 2008

नक्सली सुपऱीमों

१९९५ की गिमॆयों की बात है। बतौर िरपोटॆर गया में था। बहुचिचॆत बारा नरसंहार(११ फरवरी १९९२ की रात एक ही जाित भूिमहार के ४० लोगों को नक्सिलयों ने काट डाला था)के बाद नक्सली हौवा बन चुके थे। लगातार नक्सली घटनाअों की िरपोिटॆंग करने के बाद भी कभी नक्सिलयों से मुलाकात नहीं हुई थी। ना ही हमें उनके संगठन के संबंध में कुछ िवशेष पता था। िसफॆ उनके बाहरी संगठन जनपऱितरोध मंच के कताॆ-धताॆअों से संपकॆ था। वे भूिमगत संगठन एमसीसी के पऱेस बयान हम तक पहुंचाते थे। गया में मैं और वहां के दैिनक िहन्दुस्तान के संवाददाता िवजय नारायण (िफलहाल जागरण अागरा के संपादक)और दैिनक अाज के संवाददाता िवषणुकांत िमश्र एक साथ एक होटल के अलग-अलग कमरों में रहते थे। हम तीनों ने अपने संपकोॆं के माध्यम से एमसीसी के सुपऱीमों सागर चटजीॆ उफॆ िशबू दा से िमलने के िलए हाथ-पैर मारना शुरू िकया। एमसीसी के फऱॉटल संगठन जनपऱितरोध मंच के कताॆ-धताॆ िवजय अायाॆ ने हमें नक्सली सुपऱीमों से िमलवाने का अाश्वासन िदया। समय गुजरता गया। बात अायी-गयी सी हो गयी। इसी दौरान जून माह की एक सुबह उन्होंने तैयार रहने का संदेश िभजवाया। शाम में उनके एक पऱितिनिध के साथ हमलोग गया के गुरारू पहुंचे। िफर वहां से िवजय अायाॆ के गांव। अाधी रात को एक-एक कर बंदूक थामे लोग वहां जुटने लगे। हम सभी सत्तू घोलकर पीये और नक्सली सुपऱीमों से िमलने की उत्सुकता से इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद वहां एक और नक्सली दस्ता पहुंचा। उसने जानकारी दी की अाज मुलाकात नहीं हो पायेगी। कारण बताया गया िक कुछ पुिलस मूवमेंट की जानकारी िमली है। हमलोग रात वहीं िबताये और सुबह में गया लौट अाये। चार िदन बाद एक बार िफर मैसेज िमला िक तैयार रहें। एकबार िफर हमलोग िवजय अायाॆ के गांव पहुंचे और इंतजार करने लगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

www.blogvani.com चिट्ठाजगत