बुधवार, 3 सितंबर 2008

गोिलयों की बौछार के बीच मैं और संपादक

िसर से पांव तक धूल-धूसिरत थे हम
कभी भी हो सकता था बारूदी सुरंग िवस्फोट
हम पहली बार पुिलस-नक्सली मुठभेड़ में िघरे थे। साथ में थे िहन्दुस्तान रांची के हमारे संपादक हिरनारायण िसंह। अंधेरी रात में गोिलयों की तडतड़ाहट और दोनों अोर से ललकारने की अवाजे थीं। सुरच्छा बलों ने जब नाइट िवजन रायफल चलाया,तो पता चला िक हमलोग जहां-तहां िबखरे हुए हैं। सरक कर मैं अपने संपादक के पास गया।िसर से पांव तक हम धूल-धूसिरत थे। उन्होंने पूछा,डर तो नहीं लग रहा?
यह १२ फरवरी २००१की घटना थी। झारखंड के पलामू िजले के बालूमाथ जंगल में पुिलस ने नक्सिलयों के दो बंकर खोजे थे। वहां से हिथयार और नगदी पुिलस को हाथ लगे थे। १२ फरवरी को पुिलस बंकर को िवस्फोट कर ध्वस्त करनेवाली थी। ११ फरवरी की अाधी रात को हमारे संपादक ने कहा िक नक्सल पऱभािवत झारखंड में पुिलस की यह बड़ी सफलता है,इसका अच्छा कवरेज होना चािहए। हम दोनों अाधी रात को ही िनकल िलये। सुबह चंदवा पहुंचे और दस बजे सुबह मैं संपादक के साथ बालूमाथ थाना में था। पलामू के तत्कालीन एसपी अिनल पालटा और िजलािधकारी पऱदीप कुमार के नेतृत्व में भारी पुिलस व्यवस्था के बीच हमलोग बंकर की अोर बढ़े। १० िकलोमीटर जाने के बाद गािड़यों का हमारा कािफला ठहरा।यहां हमें बताया गया िक अागे की १० िकलोमीटर की राह पहाड़-जंगल से गुजरते पैदल तय करनी होगी। बालूमाथ का लैंडस्केप अद्भुत था। एसपी पालटा ने कहा,अागे और सुहावने नजारे िदखेंगे। हम सभी कतार में िगरते-पड़ते अागे बढ़ रहे थे। बीच-बीच में गांव िमलते, लेिकन सुनसान। पता चला िक पुिलस की गितिविध बढ़ने से लोग भय से पलायन कर गये हैं। दोपहर बाद हम सभी नक्सिलयों के बंकर के पास थे। बंकर दो पहािड़यों के बीच तराई में िस्थत नदी के िकनारे था। वह ईंट-कंकऱीट से बना दो कमरे की गुफा थी। पऱवेश द्वार झाड़-झखाड़ से बंद था। बंकर की छत पर घास उगे थे। दूसरा बंकर वहां से १०० मीटर दूर था। सीसीएल के एक्सप्लोिसव एक्सपटॆ बंकरों को उड़ाने के िलए भारी मातरा में बारूद लाये थे। बंकरों में उसे लगाया गया। २०० मीटर दूर से बारी-बारी से दोनों बंकरों में िवस्फोट िकया गया। कान के पदाॆ को िहलानेवाली अावाज हुई और धूल-धक्कड़ का गुब्बार उठा। १० िमनट तक िदन में रात जैसी िस्थित बनी रही। अबतक शाम िघरने लगी थी। वहां से िनकलते-िनकलते अंधेरा भी छाने लगा। हमलोग अपनी गािड़यों तक पहुंचे और चले। २०० मीटर अागे बढ़ते ही हमारी अोर लच्छय कर गोिलयां दागी जाने लगी। अचानक हुए इस हमले से हमारी गािड़यों के बऱेक लग गये। एसपी पालटा ने हमें जमीन पर लेट जाने को कहा। लगभग १० िमनट दोनों अोर से गोिलयां चलीं। एक दूसरे को ललकारा गया,गिरयाया गया। कुछ देर बाद िस्थित सामान्य होने पर हम िफर अागे बढ़े। जंगल की उबड़-खाबड़ पथरीली सड़क पर हम एक िकलोमीटर अागे बढ़े होंगे िक एक बार िफर गोिलयां चलने लगीं। इस बार हम पर दोतरफा फायिरंग की जा रही थी। हम उस जीप में बैठे थे,िजसमें िवस्फोट के बाद के बाद बची बारूद के बैग रखे गये थे। लगा कहीं बारूद में िवस्फोट न हो जाये। िपछली बार की तरह हम एक बार िफर गाड़ी से कूद जमीन पर पसर गये थे। यहां अाधे घंटे तक मुठभेड़ चली। नक्सली तब भागे,जब पुिलस ने एचइ बम दागा। अबतक रात के दस बज चुके थे। हमारा कािफला एक बार िफर अागे बढ़ा। अब नक्सिलयों की गोली से ज्यादा उनके बारूदी सुरंग िवस्फोट का खतरा था। यह हादसा कभी भी हो सकता था और यह सोच-सोच कर हम रामनाम जप रहे थे। भूखे-प्यासे रात एक बजे हम रांची पहुंचे और िपल पड़े अखबार में छपने के िलए एक्सक्लूिसव िरपोटॆ िलखने।

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