िवधानचंदर ने नक्सिलयों के डर से पतरकािरता छोड़ दी
नागेन्दऱ शमाॆ डेढ़ साल तक पोटा में बंद रहे
नक्सली इलाके में पतरकािरता दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। थोड़ी सी चूक से उन पर अाफत का पहाड़ टूट पड़ता है। वे कभी नक्सिलयों के िनशाने पर होते हैं,तो कभी पुिलस के। िबहार-झारखंड के ये इलाके खबर के दृिष्टकोण से काफी अहम हैं। िबहार के मगध और शाहाबाद रेज से लेकर झारखंड के उत्तरी-दिॐणी छोटानागपुर से लेकर पलामू और कोल्हान पऱमंडल में नक्सिलयों की अघोिषत सत्ता सरकार भी ना नुकुर के बावजूद स्वीकार करती है। पतरकार अखबार की जवाबदेही िनबाहते नक्सिलयों और पुिलस के बीच संतुलन साधते रहते हैं। नक्सिलयों के पऱेस बयान पतरकारों तक इस संदेश के साथ पहुंचते हैं िक जैसा िलखा है वैसा ही छपना चािहए। पतरकार खबर भी वैसे ही भेजते हैं,लेिकन संपादन में उसका हुिलया िबगड़ जाता है। बस यहीं से कस्बाई पतरकार के दुिदॆन शुरू हो जाते हैं। पलामू के पांकी पऱखंड के संवाददाता िवधानचंदर को एेसे ही हालातों में घर-पिरवार छोड़ कलकत्ता भागना पड़ा था। बीच बचाव के बाद तीन साल बाद वे घर लौटे, लेिकन दहशत एेसी की पतरकािरता से ही नाता तोड़ िलया। घर की जगह रात थाने में सोकर िबताने लगे। एेसी ही िस्थित में गढ़वा िजले के भंडिरया के संवाददाता को भी घर-पिरवार छोड़ भागना पड़ा था। हलांिक वे बाद में घर लोटे और कितपय पाबंिदयों के साथ खबर भी िलख रहे हैं।
चार साल पहले एक और एेसी ही घटना हुई। पलामू के कस्बाई पतरकार इसबार नक्सली कनेक्शन के अारोप में पोटा के तहत िगरफ्तार कर िलये गये थे। पुिलस ने उस इलाके में नक्सली सरगना दघीची राय को सािथयों सिहत मुठभेड़ में मारा था। पहाड़ की तलहटी में हुई मुठभेड़ के बाद पतरकार नागेन्दऱ शमाॆ पुिलस के हत्थे चढ़ गये। पुिलस ने मामला बनाया और पोटा में बंद कर िदया। शमाॆ नक्सिलयों के बुलाने पर अन्य पतरकारों की तरह दघीची राय के पास गये थे। उन्होंने बताया िक नक्सली सरगना दघीची राय अखबार के िलए पऱेस बयान िलख रहे थे िक पुिलस अा गयी और गोिलयां चलने लगीं। वे िकसी तरह जान बचाने में सफल रहे थे,लेिकन पुिलस ने नक्सिलयों का सहयोगी बता उन्हें पकड़ िलया। वे डेढ़ साल तक जेल में बंद रहे। उनकी िरहाई संपादक के पहल से डीजीपी के सुपरिवजन के बाद हो सकी।
पुिलस-नक्सली की इस दोधारी तलवार पर अाज भी कस्बाई पतरकार संतुलन साध संवाद संकलन और पऱेषण कर रहे हैं। अाज हालत एेसे बन गये हैंं िक संवाददाता अपनी डेट लाइन के बदले मुख्यालय के डेटलाइन से खबर छापने का अनुरोध करते हैं। उनकी डेट लाइन से खबर छपने पर सबसे पहले पुिलस उन्हें पकड़ती है। िफर शुरू होता है सवालों का अंतहीन िसलिसला। कैसे पऱेस बयान उन तक पहुंचा, कौन लाया अािद-अािद। वहीं नक्सली अपनी गितिविधयों की खबर के िलए उन पर अलग से दबाव बनाये रखते हैं। इधर कुअां-उधर खाई की इस िस्थित के बावजूद कस्बाई पतरकार अाज भी िकसी भी अखबार के मेरूदंड बने हुए हैं।
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6 टिप्पणियां:
अच्छी टिप्पणी हैं. लेकिन डाकघर में केवल नक्सली ही क्यों हैं संजय जी ?
सबसे पहले मृणाल जी को उनकी िटप्पणी के िलए बहुत-बहुत धन्यवाद। डाकघर में िसफॆ नक्सली ही नहीं रहेंगे। यह तय है,लेिकन िफलवक्त नेपाल की तरह वे यहां कब्जा कर बैठे हैं। िबहार-झारखंड,जो मेरी जन्मभूिम और कमॆभूिम है, वहां नक्सलीे एक बड़ा मसला हंैं। अाम और खास का जीवन इनसे पऱभािवत हो रहा है। यही कारण है िक िफलवक्त वे जगह पा रहे हैं।
सही कहते हैं आप...पत्रकारिता आसान पेशा नहीं रहा....
सही कहा है किसी ने-
हमसे पूछो कि कलम मांगती है कितना लहू,
लोग कहते हैं धंधा बड़े आराम का है।
अाप खुद पतरकार होने के नाते िबरादरी की मुिशिकलें बेहतर समझती हैं। पतरकािरता कभी भी अासान नहीं रही है। खासकर भाषाई पतरकािरता। रोज कुअां खोद कर पानी पीने जैसा रहा है। कस्बाई पतरकार तो रोज युद्धमुख पर इस अासा के साथ जाता है िक लौट कर अायेंगे। सच समुदऱ में अगर हरे-भरे द्वीप नहीं होते,तो सामूिदऱक कभी यातरा नहीं करता।
ब्लॉग की दुनिया में आपका हार्दिक अभिनन्दन.
आप के रचनात्मक प्रयास के हम कायल हुए.
जोर-कलम और ज्यादा.
कभी फ़ुर्सत मिले तो इस तरफ भी ज़रूर आयें.
http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/
http://saajha-sarokaar.blogspot.com/
http://hamzabaan.blogspot.com/
बहुत सटीक लिखा है आपने हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है निरंतरता की चाहत है समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें
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