शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

नक्सली अांदोलन में नया मोड़

नक्सिलयों का इितहास भले ही ७० के शुरुअाती दशक से शुरू होता है,लेिकन िबहार-झारखंड में इनकी तूंती ८० के दशक के सेकेंड हॉफ से ही बोलनी शुरू हुई। इसके पहले नक्सली मैदानी इलाके में हाथ-पांव मार अपनी औकात समझ चुके थे। यही वो समय था जब नक्सली सरगना बीएम (िवनोद िमश्र)ने भूिमगत लड़ाई की जगह लोकतांतिरक संघषॆ की राह पकड़ी। उन्होंने छोटे-छोटे नक्सली संगठनों को जोड़ १९८० के शुरू में अाइपीएफ (इंिडयन पीपुल्स फऱंट)बनाया। पऱितबंध की खट्टी-मीठी यादों के सहारे अाजादी की सुनहरी राह पर इनका कारवां बढ़ चला।
उधर,नक्सली अांदोलन की उपजाऊ भूिम भी तैयार थी। यही कारण था िक िविनयन सरीखे नक्सली नेता भूिमगत संघषॆ पर डटे रहे। एमसीसी (माअोवादी कम्यूिनस्ट सेंटर)के नाम से बाकी बचे नक्सली संगिठत होकर मैदान की जगह इस बार जंगल-पहाड़ को अपना अाधार इलाका बनाया। नक्सली अांदोलन में यह नया मोड़ था। मदनपुर की पहािड़यों से नीचे उतर नक्सली नये तौर-तरीके के साथ जनसंघषॆ का िबगूल फूंकने लगे। मदनपुर की पहािड़यां चार िजलों गया,औरंगाबाद,पलामू और चतरा िजले का जंगली इलाका था। यहां बड़े जमींदारों की काफी जमीनें थीं, लेिकन वे खुद वहां नहीं रहते थे। खेती इलाके के गरीब-गुरबा करते थे और फसल पर कब्जा भूपितयों का होता था। इसका असंतोष तो स्थानीय लोगों में था,लेिकन इसे जािहर करने की िहम्मत नहीं थी। दूसरा मसला बीड़ी पत्ता की तुड़ाई से जुड़ा था। जंगल में हाड़ तोड़ मेहनत कर बीड़ी पत्ता तोड़ कर ठेकेदारों तक स्थानीय लोग पहुंचाते थे,लेिकन उसकी उिचत मजदूरी उन्हें नहीं िमलती थी। इन सबों से अलग असंतोष का एक बड़ा कारण अात्म सम्मान से जुड़ा था। इलाके की बहू-बेिटयां बाहर से अानेवालों की िनगाहों पर चढ़ती रहती थी। लोग चाह कर भी इसका पूरजोर िवरोध करने की िस्थित में नहीं थे।
नक्सली अांदोलन के िलए पुख्ता पृष्ठभूिम तैयार थी। हिथयारबंद नक्सिलयों ने पहला काम दूर-दराज रहनेवाले भूपितयों की जमीन पर लाल झंडा गाड़ना शुरू िकया और िवरोध करनेवाले भूपितयों के साथ बंदूक से फिरयाने लगे। बीड़ी पत्ता तुड़ाई का नया दाम बांधा गया। अाकऱोिशत स्थानीय गरीब-गुरबों के िलए नक्सली हीरो बनने लगे। िजनकी वे अब तक जी हजूरी करते थे वे अब उनके सामने िरिरयाने लगे थे। बंदूक के साये में महफूज भी थे। पुिलस जंगल-पहाड़ में अाने से बचती थी,इसिलए वह मुक्त इलाका बनने लगा। कभी पुिलस की दिबश होती तो नक्सली अामने-सामने का मुकाबला करते या िफर कमजोर पड़ने पर मदनपुर की पहािड़यों का सहारा लेकर दूसरे िजलों में घुस जाते। १९९० अाते-अाते नक्सली पहाड़-जंगल छोड़ मैदानी इलाके में भी घुसने लगे।
मैदानी इलाके में नक्सली िवस्तार पर रपट अगले अंक में पढ़े

3 टिप्‍पणियां:

रंजन राजन ने कहा…

िजनकी वे अब तक जी हजूरी करते थे वे अब उनके सामने िरिरयाने लगे थे। बंदूक के साये में महफूज भी थे। पुिलस जंगल-पहाड़ में अाने से बचती थी,इसिलए वह मुक्त इलाका बनने लगा। कभी पुिलस की दिबश होती तो नक्सली अामने-सामने का मुकाबला करते या िफर कमजोर पड़ने पर मदनपुर की पहािड़यों का सहारा लेकर दूसरे िजलों में घुस जाते।......अच्छी जानकारी दी है। अगली किस्त कब लिख रहे हैं??????????

जय पुष्‍प ने कहा…

नक्‍सली आन्‍दोलन के इतिहास, भूगोल और वर्तमान और इसके साथ ही इसके समाहारों-निष्‍कर्षों आदि संबंधी तथ्‍यपरक जानकारी के लिए आप दायित्‍वबोध पत्रिका का जनवरी-माच्र 2008 का अंक देख सकते हैं। या इन लिंक्‍स पर जा सकते हैं :
http://dayitvabodh.googlepages.com/naxalbariauruttarvartichardashak.pdf
या
http://dayitvabodh.googlepages.com/

Sarvesh ने कहा…

अपने देश मे ऐसे ऐसे उपाय हैं आतंकवाद को छुपाने के लिये. जिसकी लाठी उसकी भैंस कि राज को कभी भी तार्किक नहीं किया जा सकता है। हमको टाटा और अंबानी के संपती से भी बहुत खुंदक है। क्या बिनायक सेन उसमे जा कर लड़ाई करेंगे? गरिब किसानो को बंदुक के बल पर लुटना और उसको आंदोलन जैसा नाम देना एक बहुत हि घटिया और बेहुदा तर्क है। देश के कानून को नहीं मानना और घटिया आंदोलन के नाम पर जुर्म ढाना। मदनपुर और उसके आस पास के किसान बहुत अमीर नहीं हैं। बिनायक जैसे लोगो को चाहिये कि गरिबों के कंधे पर लाठी रख राजनिति ना करें । उन्हे भी जिने दें। ऐसे बहुत सारे देशद्रोही इस देश मे जाति, धर्म और भाषा के नाम पर जेहाद छेडे़ हुए हैं।

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