सोमवार, 22 सितंबर 2008

जंगल से िनकल एेसे फैले मैदान में नक्सली

पहाड़ से उतरकर और जंगल से िनकल कर नक्सली जब मैदानी इलाके में घुसे,तो उनकी रणनीित व्यवस्था की खािमयों को अपनी खूबी बनाने की थी । उसके तहत समाज के दबंगों को अौकात बताना,पुिलिसया जुल्म का िशकार होने से बचने के िलए मामले को स्थानीय स्तर पर िनपटाना और मजदूरी के सवाल पर कड़ा रुख अपनाना था।
तय रणनीित के तहत नक्सिलयों ने उन दबंगों को टारगेट करना शुरू िकया। िजनकी तूंती बोलती थी। जो िहस्टरी शीटर थे। उनपर गुिरल्ला हमला कर ढेर िकया जाने लगा। कुछ जगहों पर नक्सिलयों को भी छित उठानी पड़ी,लेिकन माहौल एेसा बना िक नक्सली िजसे चाहेंगे,उनका काम तमाम कर सकते हैं। पूरे समाज में नक्सिलयों के इस मैसेज से दहशत कायम हो गया। दबी जुबान से ही सही लोग यह भी स्वीकारने लगे िक नक्सिलयों द्वारा टारगेट िकिलंग का खािमयाजा वैसे तत्वों को ही भुगतना पड़ रहा है,िजनसे अाम अावाम भी खौफ खाता था। नक्सली अपनी पहली रणनीित में कामयाब होने के बाद जनअदालत के कान्सेप्ट के साथ अपनी अगली रणनीित पर काम करना शुरू िकये। हर छोटे-बड़े िववाद का फैसला जनअदालत के माध्यम से होने लगा। पुिलस और अदालतों के घनचक्कर से लोगों को मुिक्त िमलने लगी। यह रणनीित इतनी कामयाब हुई िक नक्सली अाधार इलाके के थानों में केसों का टोटा पड़ गया। अदालतों में गांव से गमछा में सत्तू-प्याज बांध अानेवाले नदारद हो गये। इस मसले पर १९९५ में मैने अखबार में एक स्टोरी िलखी थी। तब मैनें कई िजला बार एसोिसएशन के लोगों से इस संबंध में बात भी िक थी और यही सामने अाया था िक अदालत में केसों की संख्या २० पऱितशत रह गयी है। यह अलग बात है िक पुिलस अब सामान्य लफड़ों की जगह नक्सली तालुक्कात के अारोप में गांवों में अाने लगी। नक्सिलयों को खाना िखलाने,उन्हें रात िबताने की जगह देने अािद के अारोप में तदाद में गऱामीण पकड़े जाने लगे।
वतॆमान में झारखंड के स्वास्थ्य सह श्रम मंतरी भानू पऱताप िसंह पर भी यह अारोप पुिलस िरकाडॆ में है। एक लाइव कायॆकऱम में हजारों लोगों के सामने मैंने मंच पर मंतरी (िदसंबर २००५ में वे िवधायक थे)से पुिलस के इस अारोप से संबंिधत सवाल िकया,तो उनका कहना था िक मेरे गांव में अगर पऱधानमंतरी भी िबना सुरत्छा के रहने लगे,तो उन्हें भी वही करना पड़ेगा,जो अाम गऱामीण करते हैं। कोई नक्सिलयों को शौक से पनाह नहीं देता। गरीब गऱामीण अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई िकसी को िखलाने की हैिशयत नहीं रखते, लेिकन उन्हें एेसा करना पड़ता है।
नक्सली जनअदालत के साथ-साथ भूिम िववादों का भी िनपटारा कर रहे थे। मजदूरों के भरोसे खेती करनेवाले बड़े खेितहरों की जमीन अब नक्सली टारगेट पर थी। मजदूरी के सवाल से शुरू होकर नक्सली उनकी जमीन पर कब्जा करने की रणनीित पर चलने लगे। खेतों में लाल झंडा गाड़ा जाने लगा। कऱंितकारी गीतों के माध्यम से उनके घर की मिहलाअों को भी गिरयाया जाने लगा। खेती पर अािश्रत भूपित भी इस नाजुक घड़ी में गोलबंद होने लगे। गया में अली सेना बनी,तो भोजपुर में कुंवर सेना,लोिरक सेना,रणवीर सेना सामने अायी। उसी तजॆ पर पलामू और चतरा में भी भूपित संगिठत हुए। ८० और ९० के दशक में अिधकांश जनसंहार इन सेनाअों और नक्सिलयों के वचॆस्व की लड़ाई में हुए। धीरे-धीरे िस्थित एसी बनने लगी िक भूपितयों को अपना सबकुछ छोड़ गांवों से पलायन करना पड़ा। गया,पलामू में तो एसे लोगों की कालोनी ही बस गयी। एक बड़े वगॆ के यह दुिदॆन के िदन थे। बच्चों की पढ़ाई छूट गयी। लड़िकयों की शादी पैसे के अभाव में बािधत हो गयी। दो जून की रोटी के िलए लोग तरह-तरह के पापड़ बेलने लगे। इनके पुनवाॆस के िलए शासन-पऱशासन को छोिड़ये, कोई सामािजक संगठन भी सामने नहीं अाया। उधर गांवों में उनके द्वारा छोड़ी गयी जमीन नक्सली गरीबों के बीच बांट चौथ वसूलने लगे। एक अांकड़े के अनुसार िसफॆ झारखंड में ८० हजार एकड़ एेसी जमीन नक्सिलयों के कब्जे में है,िजसका लगान पीिड़त भूपित दे रहे हैं।
अगले अंक में नक्सली अथॆतंतर पर िरपोटॆ

1 टिप्पणी:

Ashok Pandey ने कहा…

संजय जी, उत्‍साहवर्धन के लिए आभार। आप अच्‍छा लिख रहे हैं।

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