नक्सली समस्या के मूल में सोशल कॉिप्लकेशन नक्सली समस्या पर अब तक न मालूम िकतनी गोिष्ठयां और सेिमनारों के माध्यम से चचाॆ हो चुकी है, लेिकन अभी तक जड़ पर गंभीरता से िवमशॆ नहीं हुअा है। िविभन्न मंचों से नक्सली समस्या के मूल में गरीबी और अिशच्छा बताया जाता रहा है। अभी तक नक्सली समस्या िनवारण में भी बंदूक से अलग हट गरीबी और अिशच्छा को ही अाधार बनाकर कायॆयोजना बनायी जाती रही है। लेिकन नक्सली इलाके की हकीकत िजतना मैं समझ पाया हूं वह ऊपर के कारणों से अलहदा है। नक्सली उत्थान में इलाका िवशेष का सामािजक बुनावट िकसी भी अन्य कारण से बड़ा कारण रहा है। उसकी जड़ में गरीबी और अिशच्छा खाद-पानी जरूर देते हैं, लेिकन नक्सली समस्या के मूल में वह सोशल कॉिप्लकेशन ही है, िजसने कुछ लोगों को जान की बाजी लगाने को पऱेिरत िकया था। अव्वल तो नक्सली इलाके की कचोटने वाली सामािजक गैरबराबरी वह पहला कारण था, िजसमें पीिड़त और पऱतािड़त का िरश्ता नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका था। भूख और गरीबी से जूझना कभी उतनी बड़ी समस्या नहीं थी, िजतना अपने अात्म सम्मान को बचाना। हाड़तोड़ िजंदगी को अपना भाग्य मानने में से भी एक बड़े वगॆ को कभी गुरेज नहीं रहा है। लेिकन जब मामला सामािजक जीवन के ताने-बाने को तहस-नहस करने से जुड़ता रहा, तो अाग लगनी ही थी। अाग जलती रही, िकन्तु वह दवानल नहीं बन रहा था। अाग सुलगानेवाले भी जानते थे िक िजस सामािजक संरचना में वे हैं, वहां अाग लगाकर उसे तापना उनका काम है उसमें जलना नहीं। हर स्तर पर अपना मान मदॆन होता देखना और खून की घंूट पीकर जीवन काटना नक्सली इलाके के एक बड़े बगॆ की जमीनी सच्चाई थी। वे बाबुअों के खेत और घर में काम करते पीढ़ी दर पीढ़ी अपना जीवन गुजारते अाये थे। वे यह भी देखते रहे थे िक उनकी बहू-बेिटयों के साथ क्या कुछ िघनौना होता है। सामािजक िवसंगित, िवडंबना िवकृित का यह दंश झेलनेवाले अपने भीतर की अाग को कभी हवा देने की िस्थित में नहीं थे। नक्सली अांदोलन के नाम पर जब एेसे लोगों के सामने अपने अात्म सम्मान को बचाने के साथ पऱतािड़त करनेवालों को सबक िसखाने का मौका िमला, तो देखते-देखते नजारा बदलने लगा। |
शनिवार, 31 जनवरी 2009
नक्सली समस्या कारणः १
गुरुवार, 4 दिसंबर 2008
शनिवार, 29 नवंबर 2008
नक्सली सांसत में, पुिलस के मजे
िबना खून बहाये पकड़े जा रहे शीषॆ नक्सली
कहते हैं दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। नक्सिलयों से अािजज अायी पुिलस ने जैसे ही देखा िक नक्सली संगठन टूट की अोर है, वैसे ही पुिलस ने भगोड़े नक्सिलयों से संपकॆ साधना शुरू कर िदया। अव्वल तो उसने भगोड़ों को अपना संगठन खड़ा करने में मदद की, वहीं उनकी सूचना पर एमसीसीअाई के नेटवकॆ को भी खंगालने लगी। कल तक नक्सियों की एक भी सूचना पाने में िवफल रहनेवाली पुिलस के पास सूचनाअों का अंबार लग गया। जंगल-पहाड़ों पर अब मुठभेड़ की कहानी भी बदलने लगी। पहले जहां पुिलस लड़ती थी, वहां अब दोस्त से दुश्मन बने भगोड़े नक्सली िभड़ने लगे। िपछले दो वषॆ से िबहार-झारखंड के इलाके में शायद ही कोई िदन एेसा गुजरता है िजस िदन नक्सली और भगोड़े नक्सली नहीं िभड़ते। इससे पुिलस का काम हद तक अासान हो गया है। ९० के दशक में भी पुिलस के सामने एेसी ही िस्थित थी, जब एमसीसी और पाटीॆ यूिनटी िरटेन और िरगेन की लड़ाई लड़ती थी। पुिलस िसफॆ घटनास्थल से लाशें उठाती थी। वैसी ही िस्थित अाज है। पुिलस के पास न िसफॆ नक्सिलयों से जुड़ी सूचनाअों का अावक बढ़ा है, बिल्क उनके सही औकात का भी पता चल रहा है। यह सटीक सूचना भगोड़े नक्सली ही पुिलस तक पहुंचा रहे हैं। उसका ही पिरणाम है िक थोक में नक्सली पकड़े जा रहे हैं। वह भी िबना खून बहाये। गुमला, पलामू, गढ़वा और हजारीबाग में िसफॆ १५ िदन के भीतर नक्सिलयों के जोनल कमांडर, सब जोनल कमांडर से लेकर अनेक एिरया कमांडर तक पकड़े गये हैं। पहले एक एिरया कमांडर का पकड़ा जाना बड़ी खबर होती थी, लेिकन अाज जोनल कमांडर के पकड़े जाने पर भी सनसनी नहीं होती। अखबार भी अब इस सूचना को पहले पन्ने की जगह भीतर के पन्नों पर जगह देते हैं। यह सब हुअा है नक्सिलयों में िबखराव से। अगर यही िस्थित रही और पुिलस ने इसका पूरा फायदा उठाया, तो नक्सली बीते िदनों की कहानी बन कर रह जायेंगे।
कहते हैं दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। नक्सिलयों से अािजज अायी पुिलस ने जैसे ही देखा िक नक्सली संगठन टूट की अोर है, वैसे ही पुिलस ने भगोड़े नक्सिलयों से संपकॆ साधना शुरू कर िदया। अव्वल तो उसने भगोड़ों को अपना संगठन खड़ा करने में मदद की, वहीं उनकी सूचना पर एमसीसीअाई के नेटवकॆ को भी खंगालने लगी। कल तक नक्सियों की एक भी सूचना पाने में िवफल रहनेवाली पुिलस के पास सूचनाअों का अंबार लग गया। जंगल-पहाड़ों पर अब मुठभेड़ की कहानी भी बदलने लगी। पहले जहां पुिलस लड़ती थी, वहां अब दोस्त से दुश्मन बने भगोड़े नक्सली िभड़ने लगे। िपछले दो वषॆ से िबहार-झारखंड के इलाके में शायद ही कोई िदन एेसा गुजरता है िजस िदन नक्सली और भगोड़े नक्सली नहीं िभड़ते। इससे पुिलस का काम हद तक अासान हो गया है। ९० के दशक में भी पुिलस के सामने एेसी ही िस्थित थी, जब एमसीसी और पाटीॆ यूिनटी िरटेन और िरगेन की लड़ाई लड़ती थी। पुिलस िसफॆ घटनास्थल से लाशें उठाती थी। वैसी ही िस्थित अाज है। पुिलस के पास न िसफॆ नक्सिलयों से जुड़ी सूचनाअों का अावक बढ़ा है, बिल्क उनके सही औकात का भी पता चल रहा है। यह सटीक सूचना भगोड़े नक्सली ही पुिलस तक पहुंचा रहे हैं। उसका ही पिरणाम है िक थोक में नक्सली पकड़े जा रहे हैं। वह भी िबना खून बहाये। गुमला, पलामू, गढ़वा और हजारीबाग में िसफॆ १५ िदन के भीतर नक्सिलयों के जोनल कमांडर, सब जोनल कमांडर से लेकर अनेक एिरया कमांडर तक पकड़े गये हैं। पहले एक एिरया कमांडर का पकड़ा जाना बड़ी खबर होती थी, लेिकन अाज जोनल कमांडर के पकड़े जाने पर भी सनसनी नहीं होती। अखबार भी अब इस सूचना को पहले पन्ने की जगह भीतर के पन्नों पर जगह देते हैं। यह सब हुअा है नक्सिलयों में िबखराव से। अगर यही िस्थित रही और पुिलस ने इसका पूरा फायदा उठाया, तो नक्सली बीते िदनों की कहानी बन कर रह जायेंगे।
रविवार, 23 नवंबर 2008
एेसे िबखर रहे हैं नक्सली
पैसा बना टूट का कारण
जो पैसा नक्सिलयों ने संगठन की मजबूती के िलए उगाहे थे, वही उनके िबखराव की कहानी बन रही है। अकूत पैसा नक्सिलयों के ली़डरिशप को जहां जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी से शहरों की सकून भरी िजंदगी की अोर अाकिषॆत िकया, वहीं िनचली कतार को असंतोष से भरने लगा। पैसा (लेवी) उगाही िनचली कतार के लोग ही करते रहे हैं। पैसा कोई मार नहीं ले इसके िलए नक्सली लीडर िनचली कतार पर पूरी नजर रखते हैं। लेवी के एक-एक पैसे पर नजर रखने के िलए वजाप्ता खाता-बही और रसीद के द्वारा लेन-देन की परम्परा नक्सली संगठन में शुरू से रही है। बहरहाल, जब नक्सिलयों के िनचली कतार ने देखा िक जान जोिखम में डाल पैसा वे उगाहते हैं और मजा लीडर मार रहे हैं, तो संगठन में खलबली मचने लगी। कई लीडरों के अावास जहां शहरों में बने, वहीं उनकी संताने भी शहर की नामी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने लगे। यह सब तो चल रहा था छुप-छुपाकर, लेिकन बात फैली और दूर तलक गयी। धीरे-धीरे िनचली कतार के नक्सिलयों द्वारा लेवी के पैसे मारने की घटनाएं होने लगीं। पकड़े जाने पर उन पर कड़ी कारॆवाई भी हुई। िनचली कतार को यह बात पूरी तरह समझ में अा गयी िक गड़बडी करने पर संगठन के िनयम के तहत उनकी जान भी जा सकती है। वे कारॆवाई के डर से संगठन भी नहीं छोड़ सकते थे। िदन-रात पुिलस से बचते-बचाते जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी जीनेवाले नक्सली जहां अपना जीवन बबॆाद कर चुके थे वहीं उनका पिरवार भी उनसे दूर हो चुका था। यह सब उन्हें लगातार कचोट रहा था। अाज से सात साल पहले इसी िवपिरत परिस्थित में एक एिरया कमांडर अपने पूरे हिथयारबंद दस्ते के साथ लेवी का लाखो रुपया लेकर संगठन से भाग गया। नक्सली संगठन ने उन्हें पकड़ सबक िसखाने की भरसक कोिशश की, लेिकन वे पकड़े नहीं गये। एक तो भगोड़े नक्सली रणनीित और उनकी गितिविधयों से वािकफ थे, वहीं कैसे अपनी सुरच्छा करनी है, यह भी वे अच्छी तरह जानते थे। धीरे-धीरे रािश के साथ संगठन से भागने का तांता ही लग गया। भगोड़े नक्सिलयों ने संगठन की कारॆवाई से बचने और अपना धंधा जमाने लगे। उन्हें पकड़ने की िजम्मेवारी संभालनेवाले िनचली कतार के लोग भी उनसे हद तक सहमित रखते थे, इसिलए भगोड़े पकड़े नहीं गये। हां कुछ मुठभेड़ें जरूर हुईं। अब नक्सली संगठन में िबखराव का िनयित बनने लगी। देखते-देखते यहां-वहां से पूरा का पूरा दस्ता लेवी की बड़ी रािश लेकर भागने लगा। एमसीसीअाइ के समानांतर संगठन खड़ा करने के िलए भगोड़े अापस में हाथ िमलाने लगे। ९० के दशक में एससीसी के जनमुिक्त मोचाॆ से अलग होकर बने संगठन संघषॆ जनमुिक्त मोचाॆ का उदाहरण उनके सामने था। इसे ही अपना अादशॆ मान भगोड़े भी वजाप्ता अपना संगठन खड़ा करने लगे। झारखंड पऱस्तुित कमेटी (जेपीसी), तृतीय पऱस्तुित कमेटी (टीपीसी), झारखंड िलबरेशन टाइगसॆ (जेएलटी) और पीपुल्स िलबरेशन फऱंट अॉफ इंिडया (पीएलएफअाइ) जैसे संगठन खड़े हो गये। पीपुल्स वार से हाथ िमलाने के बाद शिक्तशाली संगठन बना एमसीसीअाइ पूरी तरह िबखराव का गवाह बन गया।
अगले अंक में पढ़े िबखराव के बाद की कहानी
जो पैसा नक्सिलयों ने संगठन की मजबूती के िलए उगाहे थे, वही उनके िबखराव की कहानी बन रही है। अकूत पैसा नक्सिलयों के ली़डरिशप को जहां जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी से शहरों की सकून भरी िजंदगी की अोर अाकिषॆत िकया, वहीं िनचली कतार को असंतोष से भरने लगा। पैसा (लेवी) उगाही िनचली कतार के लोग ही करते रहे हैं। पैसा कोई मार नहीं ले इसके िलए नक्सली लीडर िनचली कतार पर पूरी नजर रखते हैं। लेवी के एक-एक पैसे पर नजर रखने के िलए वजाप्ता खाता-बही और रसीद के द्वारा लेन-देन की परम्परा नक्सली संगठन में शुरू से रही है। बहरहाल, जब नक्सिलयों के िनचली कतार ने देखा िक जान जोिखम में डाल पैसा वे उगाहते हैं और मजा लीडर मार रहे हैं, तो संगठन में खलबली मचने लगी। कई लीडरों के अावास जहां शहरों में बने, वहीं उनकी संताने भी शहर की नामी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने लगे। यह सब तो चल रहा था छुप-छुपाकर, लेिकन बात फैली और दूर तलक गयी। धीरे-धीरे िनचली कतार के नक्सिलयों द्वारा लेवी के पैसे मारने की घटनाएं होने लगीं। पकड़े जाने पर उन पर कड़ी कारॆवाई भी हुई। िनचली कतार को यह बात पूरी तरह समझ में अा गयी िक गड़बडी करने पर संगठन के िनयम के तहत उनकी जान भी जा सकती है। वे कारॆवाई के डर से संगठन भी नहीं छोड़ सकते थे। िदन-रात पुिलस से बचते-बचाते जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी जीनेवाले नक्सली जहां अपना जीवन बबॆाद कर चुके थे वहीं उनका पिरवार भी उनसे दूर हो चुका था। यह सब उन्हें लगातार कचोट रहा था। अाज से सात साल पहले इसी िवपिरत परिस्थित में एक एिरया कमांडर अपने पूरे हिथयारबंद दस्ते के साथ लेवी का लाखो रुपया लेकर संगठन से भाग गया। नक्सली संगठन ने उन्हें पकड़ सबक िसखाने की भरसक कोिशश की, लेिकन वे पकड़े नहीं गये। एक तो भगोड़े नक्सली रणनीित और उनकी गितिविधयों से वािकफ थे, वहीं कैसे अपनी सुरच्छा करनी है, यह भी वे अच्छी तरह जानते थे। धीरे-धीरे रािश के साथ संगठन से भागने का तांता ही लग गया। भगोड़े नक्सिलयों ने संगठन की कारॆवाई से बचने और अपना धंधा जमाने लगे। उन्हें पकड़ने की िजम्मेवारी संभालनेवाले िनचली कतार के लोग भी उनसे हद तक सहमित रखते थे, इसिलए भगोड़े पकड़े नहीं गये। हां कुछ मुठभेड़ें जरूर हुईं। अब नक्सली संगठन में िबखराव का िनयित बनने लगी। देखते-देखते यहां-वहां से पूरा का पूरा दस्ता लेवी की बड़ी रािश लेकर भागने लगा। एमसीसीअाइ के समानांतर संगठन खड़ा करने के िलए भगोड़े अापस में हाथ िमलाने लगे। ९० के दशक में एससीसी के जनमुिक्त मोचाॆ से अलग होकर बने संगठन संघषॆ जनमुिक्त मोचाॆ का उदाहरण उनके सामने था। इसे ही अपना अादशॆ मान भगोड़े भी वजाप्ता अपना संगठन खड़ा करने लगे। झारखंड पऱस्तुित कमेटी (जेपीसी), तृतीय पऱस्तुित कमेटी (टीपीसी), झारखंड िलबरेशन टाइगसॆ (जेएलटी) और पीपुल्स िलबरेशन फऱंट अॉफ इंिडया (पीएलएफअाइ) जैसे संगठन खड़े हो गये। पीपुल्स वार से हाथ िमलाने के बाद शिक्तशाली संगठन बना एमसीसीअाइ पूरी तरह िबखराव का गवाह बन गया।
अगले अंक में पढ़े िबखराव के बाद की कहानी
शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
गुरुवार, 20 नवंबर 2008
मोटी रकम नक्सिलयों के पास पहुंचने लगी
जब पहाड़ से उतर मैदान में अपना अाधार तैयार करने िनकले, तो उन्हें जबदॆस्त पऱितरोध का सामना करना पड़ा। अब उन्हें अाधुिनक हिथयारों की जरुरत थी और उसके िलए पैसा उगाहने की चुनौती भी। हिथयारों के िलए नक्सिलयों ने सबसे पहले लाइसेंसधारी िकसानों को टारगेट िकया। बजाप्ता पतर िलख उन्हें अपनी बंदूकें उनके पास जमा करने का फरमान जारी िकया। कुछ ने फरमान को माना और जो नहीं माने उनके हिथयार लूटे जाने लगे। अस्सी के मध्य में इस फरमान से एेसी िस्थित बनी िक लोग डर से अपने हिथयार बंदूक की दूकानं में जमा कराने लगे। यही वह दौर था जब नक्सली गुिरल्ला हमला कर पुिलस के हिथयार लूट की रणनीित पर अागे बढ़े। लेिकन उनकी हिथयार की जरुरत इससे पूरी नहीं हो पा रही थी। यहीं पर नक्सिलयों का जुड़ाव अवैध हिथयार सप्लायरों से हुअा। बीड़ी पत्ता और छोटे-मोटे ठेकेदारों से वसूली गयी लेवी की रािश इतनी बड़ी नहीं थी िक अाधुिनक हिथयारों की खेप खरीदी जा सके। ९० का दशक शुरू होते-होते नक्सिलयों ने अपने अाथॆक अधार को िवकास से जुड़ी योजनाअंो से लेवी लेने से जोड़ िदया। शुरुअाती िदक्कतों के बाद एेसी स्थिित बनी िक कोई भी छोटा-बड़ा ठेकेदार िबना लेवी िदये काम नहीं कर सकता था। जो नक्सिलयों से समझौता नहीं कर पाये वे काम भी नहीं कर पाये। अब नक्सिलयों के पास पयाॆप्त पैसा था। अाधुिनक हिथयारों और िवस्फोटकों का जखीरा था। पीठ पीछे से पुिलस पर हमला करने वाले नक्सली अामने-सामने की लड़ाई लड़ने लगे थे। लैंड माइंस िवस्फोट का घातक तरीका वे इजाद कर चुके थे। उनकी दहशत का अालम यह था िक पऱितरोध करनेवाली िकसानों की िनजी सेनाएं िबखर गयीं। अाम-अवाम उनके फरमान को अांख मूंद स्वीकारने लगा। नब्बे के मध्य से २००० के शुरुअाती िदनों तक अापस में लड़ने वाले एमसीसी और पीपुल्स वार में एका हो गया। इस मजॆर से एमसीसी एसीसीअाइ बन गया। अब वह अपना पैर पसार खिनजों का धंधा करनेवालों की नकेल कसने लगे। वििभन्न खदान मािलकों से लेवी की मोटी रकम नक्सिलयों के पास पहुंचने लगी। यहीं पर पैसे की भरमार ने नक्सिलयों को भी भऱिमत िकया। जंगल-पहाड़ों की कष्टमय िजंदगी शहरों की अारामदायक िजंदगी का सपना देखने लगी। भारी मातरा में अा रहे पैसे ने माअो और लेिनन को बेमतलब बताना शुरू कर िदया। सशस्तर कऱंित और दीघॆकालीन लोकयुद्ध का िसद्धांत दफन होने लगा। संगठन में िबखराव का बीजारोपण हो चुका था।
अगले अंक में पढ़े नक्सली संगठन में िबखराव की दास्तान
अगले अंक में पढ़े नक्सली संगठन में िबखराव की दास्तान
सोमवार, 22 सितंबर 2008
जंगल से िनकल एेसे फैले मैदान में नक्सली
पहाड़ से उतरकर और जंगल से िनकल कर नक्सली जब मैदानी इलाके में घुसे,तो उनकी रणनीित व्यवस्था की खािमयों को अपनी खूबी बनाने की थी । उसके तहत समाज के दबंगों को अौकात बताना,पुिलिसया जुल्म का िशकार होने से बचने के िलए मामले को स्थानीय स्तर पर िनपटाना और मजदूरी के सवाल पर कड़ा रुख अपनाना था।
तय रणनीित के तहत नक्सिलयों ने उन दबंगों को टारगेट करना शुरू िकया। िजनकी तूंती बोलती थी। जो िहस्टरी शीटर थे। उनपर गुिरल्ला हमला कर ढेर िकया जाने लगा। कुछ जगहों पर नक्सिलयों को भी छित उठानी पड़ी,लेिकन माहौल एेसा बना िक नक्सली िजसे चाहेंगे,उनका काम तमाम कर सकते हैं। पूरे समाज में नक्सिलयों के इस मैसेज से दहशत कायम हो गया। दबी जुबान से ही सही लोग यह भी स्वीकारने लगे िक नक्सिलयों द्वारा टारगेट िकिलंग का खािमयाजा वैसे तत्वों को ही भुगतना पड़ रहा है,िजनसे अाम अावाम भी खौफ खाता था। नक्सली अपनी पहली रणनीित में कामयाब होने के बाद जनअदालत के कान्सेप्ट के साथ अपनी अगली रणनीित पर काम करना शुरू िकये। हर छोटे-बड़े िववाद का फैसला जनअदालत के माध्यम से होने लगा। पुिलस और अदालतों के घनचक्कर से लोगों को मुिक्त िमलने लगी। यह रणनीित इतनी कामयाब हुई िक नक्सली अाधार इलाके के थानों में केसों का टोटा पड़ गया। अदालतों में गांव से गमछा में सत्तू-प्याज बांध अानेवाले नदारद हो गये। इस मसले पर १९९५ में मैने अखबार में एक स्टोरी िलखी थी। तब मैनें कई िजला बार एसोिसएशन के लोगों से इस संबंध में बात भी िक थी और यही सामने अाया था िक अदालत में केसों की संख्या २० पऱितशत रह गयी है। यह अलग बात है िक पुिलस अब सामान्य लफड़ों की जगह नक्सली तालुक्कात के अारोप में गांवों में अाने लगी। नक्सिलयों को खाना िखलाने,उन्हें रात िबताने की जगह देने अािद के अारोप में तदाद में गऱामीण पकड़े जाने लगे।
वतॆमान में झारखंड के स्वास्थ्य सह श्रम मंतरी भानू पऱताप िसंह पर भी यह अारोप पुिलस िरकाडॆ में है। एक लाइव कायॆकऱम में हजारों लोगों के सामने मैंने मंच पर मंतरी (िदसंबर २००५ में वे िवधायक थे)से पुिलस के इस अारोप से संबंिधत सवाल िकया,तो उनका कहना था िक मेरे गांव में अगर पऱधानमंतरी भी िबना सुरत्छा के रहने लगे,तो उन्हें भी वही करना पड़ेगा,जो अाम गऱामीण करते हैं। कोई नक्सिलयों को शौक से पनाह नहीं देता। गरीब गऱामीण अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई िकसी को िखलाने की हैिशयत नहीं रखते, लेिकन उन्हें एेसा करना पड़ता है।
नक्सली जनअदालत के साथ-साथ भूिम िववादों का भी िनपटारा कर रहे थे। मजदूरों के भरोसे खेती करनेवाले बड़े खेितहरों की जमीन अब नक्सली टारगेट पर थी। मजदूरी के सवाल से शुरू होकर नक्सली उनकी जमीन पर कब्जा करने की रणनीित पर चलने लगे। खेतों में लाल झंडा गाड़ा जाने लगा। कऱंितकारी गीतों के माध्यम से उनके घर की मिहलाअों को भी गिरयाया जाने लगा। खेती पर अािश्रत भूपित भी इस नाजुक घड़ी में गोलबंद होने लगे। गया में अली सेना बनी,तो भोजपुर में कुंवर सेना,लोिरक सेना,रणवीर सेना सामने अायी। उसी तजॆ पर पलामू और चतरा में भी भूपित संगिठत हुए। ८० और ९० के दशक में अिधकांश जनसंहार इन सेनाअों और नक्सिलयों के वचॆस्व की लड़ाई में हुए। धीरे-धीरे िस्थित एसी बनने लगी िक भूपितयों को अपना सबकुछ छोड़ गांवों से पलायन करना पड़ा। गया,पलामू में तो एसे लोगों की कालोनी ही बस गयी। एक बड़े वगॆ के यह दुिदॆन के िदन थे। बच्चों की पढ़ाई छूट गयी। लड़िकयों की शादी पैसे के अभाव में बािधत हो गयी। दो जून की रोटी के िलए लोग तरह-तरह के पापड़ बेलने लगे। इनके पुनवाॆस के िलए शासन-पऱशासन को छोिड़ये, कोई सामािजक संगठन भी सामने नहीं अाया। उधर गांवों में उनके द्वारा छोड़ी गयी जमीन नक्सली गरीबों के बीच बांट चौथ वसूलने लगे। एक अांकड़े के अनुसार िसफॆ झारखंड में ८० हजार एकड़ एेसी जमीन नक्सिलयों के कब्जे में है,िजसका लगान पीिड़त भूपित दे रहे हैं।
अगले अंक में नक्सली अथॆतंतर पर िरपोटॆ
तय रणनीित के तहत नक्सिलयों ने उन दबंगों को टारगेट करना शुरू िकया। िजनकी तूंती बोलती थी। जो िहस्टरी शीटर थे। उनपर गुिरल्ला हमला कर ढेर िकया जाने लगा। कुछ जगहों पर नक्सिलयों को भी छित उठानी पड़ी,लेिकन माहौल एेसा बना िक नक्सली िजसे चाहेंगे,उनका काम तमाम कर सकते हैं। पूरे समाज में नक्सिलयों के इस मैसेज से दहशत कायम हो गया। दबी जुबान से ही सही लोग यह भी स्वीकारने लगे िक नक्सिलयों द्वारा टारगेट िकिलंग का खािमयाजा वैसे तत्वों को ही भुगतना पड़ रहा है,िजनसे अाम अावाम भी खौफ खाता था। नक्सली अपनी पहली रणनीित में कामयाब होने के बाद जनअदालत के कान्सेप्ट के साथ अपनी अगली रणनीित पर काम करना शुरू िकये। हर छोटे-बड़े िववाद का फैसला जनअदालत के माध्यम से होने लगा। पुिलस और अदालतों के घनचक्कर से लोगों को मुिक्त िमलने लगी। यह रणनीित इतनी कामयाब हुई िक नक्सली अाधार इलाके के थानों में केसों का टोटा पड़ गया। अदालतों में गांव से गमछा में सत्तू-प्याज बांध अानेवाले नदारद हो गये। इस मसले पर १९९५ में मैने अखबार में एक स्टोरी िलखी थी। तब मैनें कई िजला बार एसोिसएशन के लोगों से इस संबंध में बात भी िक थी और यही सामने अाया था िक अदालत में केसों की संख्या २० पऱितशत रह गयी है। यह अलग बात है िक पुिलस अब सामान्य लफड़ों की जगह नक्सली तालुक्कात के अारोप में गांवों में अाने लगी। नक्सिलयों को खाना िखलाने,उन्हें रात िबताने की जगह देने अािद के अारोप में तदाद में गऱामीण पकड़े जाने लगे।
वतॆमान में झारखंड के स्वास्थ्य सह श्रम मंतरी भानू पऱताप िसंह पर भी यह अारोप पुिलस िरकाडॆ में है। एक लाइव कायॆकऱम में हजारों लोगों के सामने मैंने मंच पर मंतरी (िदसंबर २००५ में वे िवधायक थे)से पुिलस के इस अारोप से संबंिधत सवाल िकया,तो उनका कहना था िक मेरे गांव में अगर पऱधानमंतरी भी िबना सुरत्छा के रहने लगे,तो उन्हें भी वही करना पड़ेगा,जो अाम गऱामीण करते हैं। कोई नक्सिलयों को शौक से पनाह नहीं देता। गरीब गऱामीण अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई िकसी को िखलाने की हैिशयत नहीं रखते, लेिकन उन्हें एेसा करना पड़ता है।
नक्सली जनअदालत के साथ-साथ भूिम िववादों का भी िनपटारा कर रहे थे। मजदूरों के भरोसे खेती करनेवाले बड़े खेितहरों की जमीन अब नक्सली टारगेट पर थी। मजदूरी के सवाल से शुरू होकर नक्सली उनकी जमीन पर कब्जा करने की रणनीित पर चलने लगे। खेतों में लाल झंडा गाड़ा जाने लगा। कऱंितकारी गीतों के माध्यम से उनके घर की मिहलाअों को भी गिरयाया जाने लगा। खेती पर अािश्रत भूपित भी इस नाजुक घड़ी में गोलबंद होने लगे। गया में अली सेना बनी,तो भोजपुर में कुंवर सेना,लोिरक सेना,रणवीर सेना सामने अायी। उसी तजॆ पर पलामू और चतरा में भी भूपित संगिठत हुए। ८० और ९० के दशक में अिधकांश जनसंहार इन सेनाअों और नक्सिलयों के वचॆस्व की लड़ाई में हुए। धीरे-धीरे िस्थित एसी बनने लगी िक भूपितयों को अपना सबकुछ छोड़ गांवों से पलायन करना पड़ा। गया,पलामू में तो एसे लोगों की कालोनी ही बस गयी। एक बड़े वगॆ के यह दुिदॆन के िदन थे। बच्चों की पढ़ाई छूट गयी। लड़िकयों की शादी पैसे के अभाव में बािधत हो गयी। दो जून की रोटी के िलए लोग तरह-तरह के पापड़ बेलने लगे। इनके पुनवाॆस के िलए शासन-पऱशासन को छोिड़ये, कोई सामािजक संगठन भी सामने नहीं अाया। उधर गांवों में उनके द्वारा छोड़ी गयी जमीन नक्सली गरीबों के बीच बांट चौथ वसूलने लगे। एक अांकड़े के अनुसार िसफॆ झारखंड में ८० हजार एकड़ एेसी जमीन नक्सिलयों के कब्जे में है,िजसका लगान पीिड़त भूपित दे रहे हैं।
अगले अंक में नक्सली अथॆतंतर पर िरपोटॆ
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