शनिवार, 21 मार्च 2009

नक्सिलयों की रीित-नीित और उद्देश्य-अंितम

तीसरा लच्छय समानांतर सरकार का होता है


गुिरल्ला युद्ध के योजनाबद्ध िवकास का लच्छय हािसल करने के बाद नक्सली संगठनों का तीसरा लच्छय होता है इलाके िवशेष में सामानांतर सकार नाने की। यह वो िस्थित होती है जब राजसत्ता की हुकूमत उस इलाके में िसफॆ पऱताक बनकर रह जाती है। इसी मुकाम पर नक्सली इलाका िवशेष को स्वतंतर घोिषत करते हैं। जैसा िक िपछले िदनों झारखंड के चतरा िजले में नक्सिलयों ने िकया भी है। सामानांतर सरकार की हैिशयत में अाना दीघॆकालीन लोकयुद्ध के दौरान छोटे-छोटे इलाकों पर कब्जा कर सशस्तर कऱांित के मागॆ पर पुनः िचिह्नत छोटे इलाके पर ज्याा दा धायान िदया जाने लगता है। इस दौरान नक्सली रणनीित पऱभाव और सबक पर भी मंथन का दौर चलता रहता है। पऱयास होता है िक जन गोलबंदी एकीकृत बना रहे। हालांिक कई बार एेसा भी होता है िक स्वतंतर करार िदये गये इलाके में राजसत्ता अपने सैन्य बल के जिरये पुनः अपना पऱभाव कायम कर ले।इस िस्थित के िलए नक्सली पहले से ही एक कायॆयोजना पर काम करते रहते हैं तथा दबाव की िस्थित के हटते ही पुनः पूवॆ की िस्थित में अा जाने का पऱयास करते हैं। रूस में लेिनन और चीन में माअो की सश्स्तर कऱांित से अिभभूत नक्सली कऱांितकारी शिक्तयों को उभारने के साथ इसका भी पऱयास करते हैं िक सामािजक-राजनीितक धऱुवीकरण की पऱिकऱया काफी तेज हो। इससे राजसत्ता का संकट गहराता है और उसके भीतर का अंतरिवरोध ज्यादा गहरा और तीखा होता जाता है। नक्सली रणनीित यह होती है िक समस्याअों के समाधान में सरकार िवफल साित हो और उसकी चौतरफा अालोचना हो। यह एक एेसी िस्थित होती है िजसमें सशस्तर जनयुद्ध िबना बाधा के तेजी से मुकाम की अोर बढ़ता है।तब सबसे िनचले और अासान स्वरूपों से शुरू कर सशस्तर छापामार रणनीित उच्चतर िस्थित की अोर तीवऱता से पऱगित करता है।इसी मुकाम पर नक्सली रणनीितकार पऱचार और पऱकाशन संगिठत कर जनयुद्ध के पछ में अंतरराष्टीय िरश्तों को बनाने और फैलाने की अोर बढ़ते हैं। पऱयास यह होता है िक िवदेशी संबंधों के जिरये अपने पछ में राजनीितक समथॆन हािसल िकया जाये। यही िसथित रूस और चीन की राजशाही के िखलाफ सशस्तर कऱांित के दौर में भी थी। राजशाही का दमन, फेिलयर और जन िवरोधी रुख ने तब लेिनन और माअो को महानायक बना िदया था। पड़ोसी देश नेपाल में भी यही हुअा और नक्सली नेता पऱचंड अाज बुलेट की जगह बैलेट से राजसत्ता में अाये हैं। भारत में राजशाही की जगह लोकशाही है तथा किमयों-खािमयों के बावजूद जनता को अपनी पसंद की सरकार चुनने का अिधकार भी है। इस बदली पिरिस्थित में नक्सली अांदोलन को लच्छय कब और कैसे िमलेगे, यह अानेवाला समय तय करेगा। लेिकन इितहास गवाह है िक बुद्ध, महावीर और गांधी के अिहंसक युद्ध में ही शािमल होता रहा है।भारत

गुरुवार, 19 मार्च 2009

नक्सिलयों की रीित-नीित और उद्देश्य-३

रलच्छय संधान के िलए अनुमािनत समयसीमा का सहारा लेते हैं नक्सली


नक्सिलयों की दूसरी योजना गुिरल्ला युद्ध का योजनाबद्ध िवकास का मूल मकसद िनकट भिवष्य में खास इलाकों को गुिरल्ला जोन में तब्दील करने करने के िलए अाधार तैयार करना होता है। इसके तहत िविशष्ट इलाके में हिथयारबंद जनाधार बनाने के िलए सैन्य टुकिड़यों की लड़ाकू छमता को उन्नत बनाने और फैलाने पर िवशेष ध्यान िदया जाता है। यही वो समय होता है जब नक्सली रणनीितकार अाधार इलाके में पऱधान जोन, गौण जोन और पऱोपेगंडा जोन में अंचलों को वगीॆकृत करने तथा उसे िचिहनत करने की नीित पर अमल शुरू करते हैं। पहली योजना की तरह ही दूसरी योजना को शुरू करने के पहले छोटी अविध तक तैयारी का काम चलाया जाता है। साथ ही यह मान कर चला जाता है िक नक्सली लच्छय और उसे पऱाप्त करने की पऱकृित को देखते हुए इसके िलए कोई िनयत समय सीमा िनधाॆिरत नहीं िकया जा सकता। इसिलए अनुमािनत समयसीमा को ध्यान में रखते हुए इसके अागे के िलए भी नक्सली तैयारी बनाये रखने की रणनीित अपनायी जाती है। नक्सली रणनीितकारों का यह भी मानना है िक शुरुअाती दौर में दुश्मनों (राजसत्ता) को सुराग िमलने से उन्हें झटका लगने की स्थिित रहती है। इसे ध्यान में रखते हुए योजना के महत्वपूणॆ तत्वों में अांिशक बदलाव लाने की नीित भी साथ-साथ चलती रहती है। इसी दूसरे दौर की नक्सली कायॆयोजना में ही बड़ी नक्सली कारॆवाइयों को अमली जामा पहनाया जाता है। इसमें दुस्साहिसक सैन्य कारॆवाइयों के जिरये छापामार िविध से पुिलस और दबंग लोगों के हिथयार जब्त िकये जाते हैं और उस हिथयार से खुद को ज्यादा अाकऱामक बनाया जाता है। इस योजना के अविध के दौरान स्थानीय जीिलमों, मुखिबरों और अातंक के पयाॆय बन चुके िचिह्नत पुिलसकिमॆयों में से कुछ को चुनकर खात्मा िकया जाता है। साथ ही घटनास्थल पर परचा छोड़ खात्मा की वजह का खुलासा िकया जाता है। सैन्य कारॆवाइ के साथ जनगोलबंदी और पऱचारात्मक उद्देश्यों पर भी ध्यान रखा जाता है। इसके तहत खुले और गुप्त तरीके से रजनीितक, अािछॆक, सामािजक और सांस्कृितक गितिवििधयां बड़े पैमाने पर चलायी जाती हैं। दूसरी योजना के तहत नरसंहार, पुिलस और सामंतों पर हमले की पऱितिकऱयास्वरूप राजसत्ता ज्यादा कठोर और पऱितशोध की भावना से कारॆवाई करता है। इससे नरसंहारों और हमलों की घटनाएं कई गुणा बढ़ जाती हैं। पुिलिसया अॉपरेशन बड़े पैमाने पर शुरू होता है। इस िस्थित में नक्सली पूवॆ िनधाॆिरत रणनीित गुिरल्ला युद्ध के तहत बचाव और अाकऱमण करते हैं। वहीं िविभन्न वगोॆ को गोलवंद करने के िलए कई फऱंट नक्सली िहत में कानूनी और मानवािधकार के मसले को उठाते रहते हैं। िवशेषकर शहरी इलाके में कऱांितकारी राजनीित के पऱचार-पऱसार और पऱितिकऱयावादी राजसत्ता की जनिवरोधी कारॆवाइयों को पऱचािरत करने पर िवशेष जोर िदया जाता है।

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तीसरा लच्छय सामानांतर सरकार का होता है

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

नक्सिलयों की रीित-नीित और उद्देश्य-२


महत्वपूणॆ पड़ाव होता है नक्सली अाकऱमण पर रोक की रणनीित


नक्सली रणनीितकार अाकऱमक कारॆवाइयों पर रोक और रच्छात्मक कारॆवाइयों पर जोर की रणनीित को दीघॆकालीन जनयुद्ध की राह में एक महत्वपूणॆ पड़ाव मानते हैं। वे मानते हैं िक एेसा नहीं होने पर अारंिभक जन उभार को बगावत समझ बैठने की गलतफहमी हो सकती है। इसिलए इस पड़ाव का उपयोग करते हुए नक्सली जनयुद्ध की दीघॆकालीन चिरतर की समझ को एकदम शुरू में ही िवशेष ध्यान देकर अपने अाधार वगॆ अात्मसात कराना जरूरी मानते हैं। यही वह समय होता है, जब राजसत्ता कठोर कारॆवाई के िलए तत्पर होता है। नक्सली रच्छात्मक कारॆवाई करते हैं। अाधार इलाके में पुिलस तथा अद्धॆसैिनक बलों की बूटों की धमक सुनाई पड़ने लगती है। हाडॆकोर नक्सली रच्छात्मक रणनीित के कारण उनकी पकड़ से दूर रहते हैं और समथॆक वगॆ दमन का िशकार बनता है। पुिलिसया दमन िजतना तीखा होता है समथॆक वगॆ का गुस्सा भी राजसत्ता के िखलाफ उतना ही भड़कता है। इस पऱिकऱया से नक्सली अांदोलन को मजबूती िमलने लगती है। इसे नक्सली रणनीितकार शानदार शुरूअाती सफलता मानते हैं। यही से शुरू होता है सुिनयोिजत रूप से जनसमुदायों को जनयुद्ध के िलए संगिठत करने और राजसत्ता के िखलाफ युद्ध जारी रखने के िलए पऱेिरत करने का काम। इसी मुकाम पर खुला तथा गुप्त गितिविधयों को तेज िकया जाता है। नक्सली रणनीितकार मान कर चलते हैं िक सरकार उनकी खुली गितिविधयों को बािधत करेगी और अमूमन एेसा होता भी है। इस िस्थित में खुली गितिविधयों को चलाने के िलए नक्सली चुहा-िबल्ली का खेल पऱशासन के साथ खेलते हैं। परिस्थित के अनुसार नये रूप और तरीके से गितिविधयों को जारी रखा जाता है। पऱयास यह होता है िक अगऱणी मानवािधकार संगठन और रसूखवाले नागिरक मानवािधकारों के हनन के िखलाफ खुलकर सामने अाये। दूसरी अोर जनजुड़ाव मजबूत करने की रणनीित के तहत जनअदालतों के माध्यम से सुलभ व त्विरत न्याय देना, भूिम और मजदूरी के सवाल पर लोगों को संगिठत करना, मेिडकल कैंप लगाना तथा सवॆहारा वगॆ से तादात्म स्थािपत करने का काम चलता रहता है। यही वो समय होता है जब सरकार नक्सिलयों को मुख्यधारा में वापस लाने की कसरत शुरू करती है। एक सवॆमान्य धारणा बनने लगती है िक नक्सली समस्या का समाधान सरकारी बंदूक नहीं बन सकती। मीिडया से लेकर पऱबुद्ध जन तक मानने लगते हैं िक नक्सली अांदोलन को खाद-पानी देनेवाले कारकों को खत्म करना होगा। भूिम िववादों का िनपटारा, सामंती सोच को बदलना, सवॆहारा को िवकास की मुख्यधारा से जोड़ने और बेरोजगारों को काम देना जैसी मूल समस्याअों की अोर शासन और पऱशासन का ध्यान जाता है। इसपर िकतना अमल होता है, यह अलग बहस का मुद्दा है, लेिकन नक्सली इसे भी एक अदद सरकारी षड़यंतर ही मानते हैं। इसी पड़ाव से शुरू होता है गुिरल्ला युद्ध के योजनाबद्ध िकऱयान्वयन का दौर।
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लच्छय पऱिप्त के िलए तय होती है अनुमािनत समय-सीमा

मंगलवार, 3 मार्च 2009

नक्सिलयों की रीित-नीित और उद्देश्य-१

पहला चरण-शुरू करना और जारी रखाना

दीघॆकालीन जनयुद्ध के मंतर के साथ सशस्तर कऱांित की राह पर चलना शुरू करने और मुकाम की अोर बढ़ने का नक्सिलयों का एक सुिनयोिजत कायॆकऱम होता है। पहला कदम शुरू करना और जारी रखना होता है। दूसरा चरण गुिरल्ला युद्ध का योजनाबद्ध िवकास तथा तीसरा कायॆकऱम पऱभाव, सबक और उसके अाधार पर भावी कायॆनीित का होता है।नेपाल की कम्युिनस्ट पाटीॆ (माअोवादी) की केंदऱीय कमेटी के अंगऱेजी मुख्य पतर द वक्सॆ के अनुसार नक्सली लच्छय की पहली कायॆयोजना शुरू करना और जारी रखना के िलए माकूल स्थान और पिरवेश के चुनाव का होता है। साथ ही यह ध्यान रखा जाता है िक दीघॆकालीन लोकयुद्ध के िलए वहां तीन राजनीितक चरणों को पूरा करने का अवसर हो। मसलन रणनीितक रच्छा, रणनीितक अाकऱमण और रणनीितक अवरोध के िलए जनसहयोग की िस्थित उपलब्ध हो। इसके िलए सवॆहारा बहुल इलाका ज्यादा माकूल बैठता है। इसके पीछे यह तकॆ होता है िक िजनके पास खोने को बहुत कुछ नहीं होता, वही कुछ भी कर गुजरने का साहस रख सकता है। दीघॆकालीन लोकयुद्ध की पहली सीढ़ी रणनीितक रच्छा में भी अनेक कायॆनीितक चरण होते हैं। इसमें मुख्यतः शुरूअात की अंितम तैयारी, गुिरल्ला जोनों का िनमाॆण तथा अाधार इलाके का िनमाॆण शािमल होते हैं। पहली योजना का मूल मकसद जनयुद्ध की िदशा में व्यावहािरक पहल लेना, राजसत्ता पर कब्जा करने के िलए सशस्तर कऱांित की राजनीित से अाम अावाम के िविभन्न िहस्से को जोड़ना, संगठन के मुख्य स्वरूप के तौर पर जनसेना (पीपुल्स अामीॆ) का गठन तथा संघषॆ को धार देने के िलए सशस्तर गितिविधयों को चलाने की पऱिकऱया को शुरू करना होता है। िवदऱोह करना एक मौिलक अिधकार है के में िवश्वास करते हुए व्यवस्था की खािमयों को को अागे कर व्यवस्था और राजसत्ता के िखलाफ जनता को वदऱोह करने के िलए संगिठत करना नक्सली अांदोलन की राह पर रखा गया पहला कदम होता है। शुरू में भौितक उपलिब्धयों पर ज्यादा जोर नहीं होता। िसफॆ यह ध्यान रखा जाता है िक लोगों में उनका राजनीितक संदेश जाये और अिधकतम राजनीितक पऱचार हो। लेिकन व्यावहािरक रूप में जनयुद्ध की शुरूअात व्यवस्था के पऱतीक पुिलस चौकी, सामंत, सरकारी भवन और िहस्टरीशीटरों अािद पर सटीक ढंग से अाकऱमण के रूप में जनयुद्ध की शुरूअात का उदघोष िकया जाता है। इसे लगातार िकया जाता है तािक ज्यादा से ज्यादा पऱचार िमले और उनकी सैन्य औकात का भी खुलासा हो सके। यह समय नक्सली अांदोलन का पऱचारात्मक दौर भी होता है। साथ ही इसकी पूरी कोिशश होती है िक मीिडया जनयुद्ध के भूत को जानने-समझने को उत्सुक हो। इस योजना के उपर कदमता करते हुए नक्सली अांदोलन खुद को इस तेवर में लाता है िक राजनीितक शिक्तयां और राजनीितक मानस की यह बाध्यता बने िक वे नक्सली राजनीित के रू-ब-रू होकर अपनी राय बनाये। इस कायॆयोजना का बुिनयादी मकसद पूरा होने के बाद एक नयी कायॆयोजना शुरू की जाती है। इसमें अाकऱमक कारॆवाइयों को रोकना और रच्छात्मक कारॆवाइयों को जारी रखने की रणनीित अपनायी जाती है।


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एक महत्वपूणॆ पड़ाव होता है नक्सली अाकऱमण पर रोक की रणनीित

सोमवार, 2 मार्च 2009

नक्सली समस्या कारणः २

नक्सली अांदोलन को पुिलस से भी िमला खाद-पानी

यह सुनने-जानने में अटपटा लग सकता है िक अपने दुश्मन नंबर एक नक्सिलयों के फलने-फूलने में पुिलस भी काफी हद तक सहायक रही है। शुरू में जब नक्सली िकसी गांव में वारदात करते थे, तो पुिलस गांव के उन सवॆहारा तबके को टारगेट करती थी, िजनपर मुखिबीरी का सुबहा होता था। दजॆनों लोगों को पकड़ा जाता था और हद तक उन्हें पऱतािड़त िकया जाता था। यह सब गांव के दबंगों के इशारे पर होता था। धीरे-धीरे हालत एेसी बनने लगी िक िकसी गांव में नक्सली कारॆवाई होते ही वहां का सवॆहारा वगॆ पुिलस के अाने के पहले ही घर-बार छोड़ भाग जाता था। नक्सिलयों के िलए यह मन मांगी मुराद जैसी होती थी। बाद में यही सवॆहारा नक्सिलयों के िलए इाका िवशेष में अाधार बनते गये। अाज भी एेसे हजारों लोग हैं, जो नक्सली गितिविध से िबना जुड़े़ पुिलस केस में फंसे हैं। इनमें से अिधकांश बाद में मरता क्या नहीं करता की तजॆ पर िकसी न िकसी रूप में नक्सिलयों से जुड़ते गये। इस तरह नक्सली अांदोलन का दायरा बढ़ता गया और वे हद तक बेकाबू भी बन गये। पुिलस के कुछ अफसर तब भी यह मानते थे िक नक्सिलयों के लोकल कनेक्शन असली मुसीबत हैं। पलामू में रहे एक एसपी ने मुझसे अॉन द िरकाडॆ कहा था गांवों में रहने वाले उनके सभी चौकीदार नक्सिलयों से िमले हैं। पुिलस की ९० फीसदी योजना की जानकारी उन्हें समय रहते िमल जाती है। बताते चलें िक लगभग सभी चौकीदार उस तबके से अाते हैं, िजनका दुराव गांव के बड़े लोगों से होता है। ये जहां गरीब होते हैं, वहीं सवॆहारा तबके से जुड़ाव महसूस करते हैं। बाकी बचे १० फीसदी चौकीदार की िस्थित सांप-छछूंदर जैसी होती है। पुिलस और नक्सिलयों के बीच तालमेल िबठाने में उनकी सांस फूली रहती है। अपने काम के पऱित वफादार चौकीदारों को नक्सिलयों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है। पऱत्येक वषॆ अाठ से दस चौकीदारों को नक्सली मुखिबरी के अारोप में मौत के घाट उतारते हैं।

शनिवार, 31 जनवरी 2009

नक्सली समस्या कारणः १


नक्सली समस्या के मूल में सोशल कॉिप्लकेशन


नक्सली समस्या पर अब तक न मालूम िकतनी गोिष्ठयां और सेिमनारों के माध्यम से चचाॆ हो चुकी है, लेिकन अभी तक जड़ पर गंभीरता से िवमशॆ नहीं हुअा है। िविभन्न मंचों से नक्सली समस्या के मूल में गरीबी और अिशच्छा बताया जाता रहा है। अभी तक नक्सली समस्या िनवारण में भी बंदूक से अलग हट गरीबी और अिशच्छा को ही अाधार बनाकर कायॆयोजना बनायी जाती रही है। लेिकन नक्सली इलाके की हकीकत िजतना मैं समझ पाया हूं वह ऊपर के कारणों से अलहदा है। नक्सली उत्थान में इलाका िवशेष का सामािजक बुनावट िकसी भी अन्य कारण से बड़ा कारण रहा है। उसकी जड़ में गरीबी और अिशच्छा खाद-पानी जरूर देते हैं, लेिकन नक्सली समस्या के मूल में वह सोशल कॉिप्लकेशन ही है, िजसने कुछ लोगों को जान की बाजी लगाने को पऱेिरत िकया था। अव्वल तो नक्सली इलाके की कचोटने वाली सामािजक गैरबराबरी वह पहला कारण था, िजसमें पीिड़त और पऱतािड़त का िरश्ता नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका था। भूख और गरीबी से जूझना कभी उतनी बड़ी समस्या नहीं थी, िजतना अपने अात्म सम्मान को बचाना। हाड़तोड़ िजंदगी को अपना भाग्य मानने में से भी एक बड़े वगॆ को कभी गुरेज नहीं रहा है। लेिकन जब मामला सामािजक जीवन के ताने-बाने को तहस-नहस करने से जुड़ता रहा, तो अाग लगनी ही थी। अाग जलती रही, िकन्तु वह दवानल नहीं बन रहा था। अाग सुलगानेवाले भी जानते थे िक िजस सामािजक संरचना में वे हैं, वहां अाग लगाकर उसे तापना उनका काम है उसमें जलना नहीं। हर स्तर पर अपना मान मदॆन होता देखना और खून की घंूट पीकर जीवन काटना नक्सली इलाके के एक बड़े बगॆ की जमीनी सच्चाई थी। वे बाबुअों के खेत और घर में काम करते पीढ़ी दर पीढ़ी अपना जीवन गुजारते अाये थे। वे यह भी देखते रहे थे िक उनकी बहू-बेिटयों के साथ क्या कुछ िघनौना होता है। सामािजक िवसंगित, िवडंबना िवकृित का यह दंश झेलनेवाले अपने भीतर की अाग को कभी हवा देने की िस्थित में नहीं थे। नक्सली अांदोलन के नाम पर जब एेसे लोगों के सामने अपने अात्म सम्मान को बचाने के साथ पऱतािड़त करनेवालों को सबक िसखाने का मौका िमला, तो देखते-देखते नजारा बदलने लगा।

शनिवार, 29 नवंबर 2008

नक्सली सांसत में, पुिलस के मजे

िबना खून बहाये पकड़े जा रहे शीषॆ नक्सली
कहते हैं दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। नक्सिलयों से अािजज अायी पुिलस ने जैसे ही देखा िक नक्सली संगठन टूट की अोर है, वैसे ही पुिलस ने भगोड़े नक्सिलयों से संपकॆ साधना शुरू कर िदया। अव्वल तो उसने भगोड़ों को अपना संगठन खड़ा करने में मदद की, वहीं उनकी सूचना पर एमसीसीअाई के नेटवकॆ को भी खंगालने लगी। कल तक नक्सियों की एक भी सूचना पाने में िवफल रहनेवाली पुिलस के पास सूचनाअों का अंबार लग गया। जंगल-पहाड़ों पर अब मुठभेड़ की कहानी भी बदलने लगी। पहले जहां पुिलस लड़ती थी, वहां अब दोस्त से दुश्मन बने भगोड़े नक्सली िभड़ने लगे। िपछले दो वषॆ से िबहार-झारखंड के इलाके में शायद ही कोई िदन एेसा गुजरता है िजस िदन नक्सली और भगोड़े नक्सली नहीं िभड़ते। इससे पुिलस का काम हद तक अासान हो गया है। ९० के दशक में भी पुिलस के सामने एेसी ही िस्थित थी, जब एमसीसी और पाटीॆ यूिनटी िरटेन और िरगेन की लड़ाई लड़ती थी। पुिलस िसफॆ घटनास्थल से लाशें उठाती थी। वैसी ही िस्थित अाज है। पुिलस के पास न िसफॆ नक्सिलयों से जुड़ी सूचनाअों का अावक बढ़ा है, बिल्क उनके सही औकात का भी पता चल रहा है। यह सटीक सूचना भगोड़े नक्सली ही पुिलस तक पहुंचा रहे हैं। उसका ही पिरणाम है िक थोक में नक्सली पकड़े जा रहे हैं। वह भी िबना खून बहाये। गुमला, पलामू, गढ़वा और हजारीबाग में िसफॆ १५ िदन के भीतर नक्सिलयों के जोनल कमांडर, सब जोनल कमांडर से लेकर अनेक एिरया कमांडर तक पकड़े गये हैं। पहले एक एिरया कमांडर का पकड़ा जाना बड़ी खबर होती थी, लेिकन अाज जोनल कमांडर के पकड़े जाने पर भी सनसनी नहीं होती। अखबार भी अब इस सूचना को पहले पन्ने की जगह भीतर के पन्नों पर जगह देते हैं। यह सब हुअा है नक्सिलयों में िबखराव से। अगर यही िस्थित रही और पुिलस ने इसका पूरा फायदा उठाया, तो नक्सली बीते िदनों की कहानी बन कर रह जायेंगे।

रविवार, 23 नवंबर 2008

एेसे िबखर रहे हैं नक्सली

पैसा बना टूट का कारण
जो पैसा नक्सिलयों ने संगठन की मजबूती के िलए उगाहे थे, वही उनके िबखराव की कहानी बन रही है। अकूत पैसा नक्सिलयों के ली़डरिशप को जहां जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी से शहरों की सकून भरी िजंदगी की अोर अाकिषॆत िकया, वहीं िनचली कतार को असंतोष से भरने लगा। पैसा (लेवी) उगाही िनचली कतार के लोग ही करते रहे हैं। पैसा कोई मार नहीं ले इसके िलए नक्सली लीडर िनचली कतार पर पूरी नजर रखते हैं। लेवी के एक-एक पैसे पर नजर रखने के िलए वजाप्ता खाता-बही और रसीद के द्वारा लेन-देन की परम्परा नक्सली संगठन में शुरू से रही है। बहरहाल, जब नक्सिलयों के िनचली कतार ने देखा िक जान जोिखम में डाल पैसा वे उगाहते हैं और मजा लीडर मार रहे हैं, तो संगठन में खलबली मचने लगी। कई लीडरों के अावास जहां शहरों में बने, वहीं उनकी संताने भी शहर की नामी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने लगे। यह सब तो चल रहा था छुप-छुपाकर, लेिकन बात फैली और दूर तलक गयी। धीरे-धीरे िनचली कतार के नक्सिलयों द्वारा लेवी के पैसे मारने की घटनाएं होने लगीं। पकड़े जाने पर उन पर कड़ी कारॆवाई भी हुई। िनचली कतार को यह बात पूरी तरह समझ में अा गयी िक गड़बडी करने पर संगठन के िनयम के तहत उनकी जान भी जा सकती है। वे कारॆवाई के डर से संगठन भी नहीं छोड़ सकते थे। िदन-रात पुिलस से बचते-बचाते जंगल-पहाड़ की दुरूह िजंदगी जीनेवाले नक्सली जहां अपना जीवन बबॆाद कर चुके थे वहीं उनका पिरवार भी उनसे दूर हो चुका था। यह सब उन्हें लगातार कचोट रहा था। अाज से सात साल पहले इसी िवपिरत परिस्थित में एक एिरया कमांडर अपने पूरे हिथयारबंद दस्ते के साथ लेवी का लाखो रुपया लेकर संगठन से भाग गया। नक्सली संगठन ने उन्हें पकड़ सबक िसखाने की भरसक कोिशश की, लेिकन वे पकड़े नहीं गये। एक तो भगोड़े नक्सली रणनीित और उनकी गितिविधयों से वािकफ थे, वहीं कैसे अपनी सुरच्छा करनी है, यह भी वे अच्छी तरह जानते थे। धीरे-धीरे रािश के साथ संगठन से भागने का तांता ही लग गया। भगोड़े नक्सिलयों ने संगठन की कारॆवाई से बचने और अपना धंधा जमाने लगे। उन्हें पकड़ने की िजम्मेवारी संभालनेवाले िनचली कतार के लोग भी उनसे हद तक सहमित रखते थे, इसिलए भगोड़े पकड़े नहीं गये। हां कुछ मुठभेड़ें जरूर हुईं। अब नक्सली संगठन में िबखराव का िनयित बनने लगी। देखते-देखते यहां-वहां से पूरा का पूरा दस्ता लेवी की बड़ी रािश लेकर भागने लगा। एमसीसीअाइ के समानांतर संगठन खड़ा करने के िलए भगोड़े अापस में हाथ िमलाने लगे। ९० के दशक में एससीसी के जनमुिक्त मोचाॆ से अलग होकर बने संगठन संघषॆ जनमुिक्त मोचाॆ का उदाहरण उनके सामने था। इसे ही अपना अादशॆ मान भगोड़े भी वजाप्ता अपना संगठन खड़ा करने लगे। झारखंड पऱस्तुित कमेटी (जेपीसी), तृतीय पऱस्तुित कमेटी (टीपीसी), झारखंड िलबरेशन टाइगसॆ (जेएलटी) और पीपुल्स िलबरेशन फऱंट अॉफ इंिडया (पीएलएफअाइ) जैसे संगठन खड़े हो गये। पीपुल्स वार से हाथ िमलाने के बाद शिक्तशाली संगठन बना एमसीसीअाइ पूरी तरह िबखराव का गवाह बन गया।
अगले अंक में पढ़े िबखराव के बाद की कहानी

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

मोटी रकम नक्सिलयों के पास पहुंचने लगी

जब पहाड़ से उतर मैदान में अपना अाधार तैयार करने िनकले, तो उन्हें जबदॆस्त पऱितरोध का सामना करना पड़ा। अब उन्हें अाधुिनक हिथयारों की जरुरत थी और उसके िलए पैसा उगाहने की चुनौती भी। हिथयारों के िलए नक्सिलयों ने सबसे पहले लाइसेंसधारी िकसानों को टारगेट िकया। बजाप्ता पतर िलख उन्हें अपनी बंदूकें उनके पास जमा करने का फरमान जारी िकया। कुछ ने फरमान को माना और जो नहीं माने उनके हिथयार लूटे जाने लगे। अस्सी के मध्य में इस फरमान से एेसी िस्थित बनी िक लोग डर से अपने हिथयार बंदूक की दूकानं में जमा कराने लगे। यही वह दौर था जब नक्सली गुिरल्ला हमला कर पुिलस के हिथयार लूट की रणनीित पर अागे बढ़े। लेिकन उनकी हिथयार की जरुरत इससे पूरी नहीं हो पा रही थी। यहीं पर नक्सिलयों का जुड़ाव अवैध हिथयार सप्लायरों से हुअा। बीड़ी पत्ता और छोटे-मोटे ठेकेदारों से वसूली गयी लेवी की रािश इतनी बड़ी नहीं थी िक अाधुिनक हिथयारों की खेप खरीदी जा सके। ९० का दशक शुरू होते-होते नक्सिलयों ने अपने अाथॆक अधार को िवकास से जुड़ी योजनाअंो से लेवी लेने से जोड़ िदया। शुरुअाती िदक्कतों के बाद एेसी स्थिित बनी िक कोई भी छोटा-बड़ा ठेकेदार िबना लेवी िदये काम नहीं कर सकता था। जो नक्सिलयों से समझौता नहीं कर पाये वे काम भी नहीं कर पाये। अब नक्सिलयों के पास पयाॆप्त पैसा था। अाधुिनक हिथयारों और िवस्फोटकों का जखीरा था। पीठ पीछे से पुिलस पर हमला करने वाले नक्सली अामने-सामने की लड़ाई लड़ने लगे थे। लैंड माइंस िवस्फोट का घातक तरीका वे इजाद कर चुके थे। उनकी दहशत का अालम यह था िक पऱितरोध करनेवाली िकसानों की िनजी सेनाएं िबखर गयीं। अाम-अवाम उनके फरमान को अांख मूंद स्वीकारने लगा। नब्बे के मध्य से २००० के शुरुअाती िदनों तक अापस में लड़ने वाले एमसीसी और पीपुल्स वार में एका हो गया। इस मजॆर से एमसीसी एसीसीअाइ बन गया। अब वह अपना पैर पसार खिनजों का धंधा करनेवालों की नकेल कसने लगे। वििभन्न खदान मािलकों से लेवी की मोटी रकम नक्सिलयों के पास पहुंचने लगी। यहीं पर पैसे की भरमार ने नक्सिलयों को भी भऱिमत िकया। जंगल-पहाड़ों की कष्टमय िजंदगी शहरों की अारामदायक िजंदगी का सपना देखने लगी। भारी मातरा में अा रहे पैसे ने माअो और लेिनन को बेमतलब बताना शुरू कर िदया। सशस्तर कऱंित और दीघॆकालीन लोकयुद्ध का िसद्धांत दफन होने लगा। संगठन में िबखराव का बीजारोपण हो चुका था।

अगले अंक में पढ़े नक्सली संगठन में िबखराव की दास्तान

सोमवार, 22 सितंबर 2008

जंगल से िनकल एेसे फैले मैदान में नक्सली

पहाड़ से उतरकर और जंगल से िनकल कर नक्सली जब मैदानी इलाके में घुसे,तो उनकी रणनीित व्यवस्था की खािमयों को अपनी खूबी बनाने की थी । उसके तहत समाज के दबंगों को अौकात बताना,पुिलिसया जुल्म का िशकार होने से बचने के िलए मामले को स्थानीय स्तर पर िनपटाना और मजदूरी के सवाल पर कड़ा रुख अपनाना था।
तय रणनीित के तहत नक्सिलयों ने उन दबंगों को टारगेट करना शुरू िकया। िजनकी तूंती बोलती थी। जो िहस्टरी शीटर थे। उनपर गुिरल्ला हमला कर ढेर िकया जाने लगा। कुछ जगहों पर नक्सिलयों को भी छित उठानी पड़ी,लेिकन माहौल एेसा बना िक नक्सली िजसे चाहेंगे,उनका काम तमाम कर सकते हैं। पूरे समाज में नक्सिलयों के इस मैसेज से दहशत कायम हो गया। दबी जुबान से ही सही लोग यह भी स्वीकारने लगे िक नक्सिलयों द्वारा टारगेट िकिलंग का खािमयाजा वैसे तत्वों को ही भुगतना पड़ रहा है,िजनसे अाम अावाम भी खौफ खाता था। नक्सली अपनी पहली रणनीित में कामयाब होने के बाद जनअदालत के कान्सेप्ट के साथ अपनी अगली रणनीित पर काम करना शुरू िकये। हर छोटे-बड़े िववाद का फैसला जनअदालत के माध्यम से होने लगा। पुिलस और अदालतों के घनचक्कर से लोगों को मुिक्त िमलने लगी। यह रणनीित इतनी कामयाब हुई िक नक्सली अाधार इलाके के थानों में केसों का टोटा पड़ गया। अदालतों में गांव से गमछा में सत्तू-प्याज बांध अानेवाले नदारद हो गये। इस मसले पर १९९५ में मैने अखबार में एक स्टोरी िलखी थी। तब मैनें कई िजला बार एसोिसएशन के लोगों से इस संबंध में बात भी िक थी और यही सामने अाया था िक अदालत में केसों की संख्या २० पऱितशत रह गयी है। यह अलग बात है िक पुिलस अब सामान्य लफड़ों की जगह नक्सली तालुक्कात के अारोप में गांवों में अाने लगी। नक्सिलयों को खाना िखलाने,उन्हें रात िबताने की जगह देने अािद के अारोप में तदाद में गऱामीण पकड़े जाने लगे।
वतॆमान में झारखंड के स्वास्थ्य सह श्रम मंतरी भानू पऱताप िसंह पर भी यह अारोप पुिलस िरकाडॆ में है। एक लाइव कायॆकऱम में हजारों लोगों के सामने मैंने मंच पर मंतरी (िदसंबर २००५ में वे िवधायक थे)से पुिलस के इस अारोप से संबंिधत सवाल िकया,तो उनका कहना था िक मेरे गांव में अगर पऱधानमंतरी भी िबना सुरत्छा के रहने लगे,तो उन्हें भी वही करना पड़ेगा,जो अाम गऱामीण करते हैं। कोई नक्सिलयों को शौक से पनाह नहीं देता। गरीब गऱामीण अपनी हाड़तोड़ मेहनत की कमाई िकसी को िखलाने की हैिशयत नहीं रखते, लेिकन उन्हें एेसा करना पड़ता है।
नक्सली जनअदालत के साथ-साथ भूिम िववादों का भी िनपटारा कर रहे थे। मजदूरों के भरोसे खेती करनेवाले बड़े खेितहरों की जमीन अब नक्सली टारगेट पर थी। मजदूरी के सवाल से शुरू होकर नक्सली उनकी जमीन पर कब्जा करने की रणनीित पर चलने लगे। खेतों में लाल झंडा गाड़ा जाने लगा। कऱंितकारी गीतों के माध्यम से उनके घर की मिहलाअों को भी गिरयाया जाने लगा। खेती पर अािश्रत भूपित भी इस नाजुक घड़ी में गोलबंद होने लगे। गया में अली सेना बनी,तो भोजपुर में कुंवर सेना,लोिरक सेना,रणवीर सेना सामने अायी। उसी तजॆ पर पलामू और चतरा में भी भूपित संगिठत हुए। ८० और ९० के दशक में अिधकांश जनसंहार इन सेनाअों और नक्सिलयों के वचॆस्व की लड़ाई में हुए। धीरे-धीरे िस्थित एसी बनने लगी िक भूपितयों को अपना सबकुछ छोड़ गांवों से पलायन करना पड़ा। गया,पलामू में तो एसे लोगों की कालोनी ही बस गयी। एक बड़े वगॆ के यह दुिदॆन के िदन थे। बच्चों की पढ़ाई छूट गयी। लड़िकयों की शादी पैसे के अभाव में बािधत हो गयी। दो जून की रोटी के िलए लोग तरह-तरह के पापड़ बेलने लगे। इनके पुनवाॆस के िलए शासन-पऱशासन को छोिड़ये, कोई सामािजक संगठन भी सामने नहीं अाया। उधर गांवों में उनके द्वारा छोड़ी गयी जमीन नक्सली गरीबों के बीच बांट चौथ वसूलने लगे। एक अांकड़े के अनुसार िसफॆ झारखंड में ८० हजार एकड़ एेसी जमीन नक्सिलयों के कब्जे में है,िजसका लगान पीिड़त भूपित दे रहे हैं।
अगले अंक में नक्सली अथॆतंतर पर िरपोटॆ

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

नक्सली अांदोलन में नया मोड़

नक्सिलयों का इितहास भले ही ७० के शुरुअाती दशक से शुरू होता है,लेिकन िबहार-झारखंड में इनकी तूंती ८० के दशक के सेकेंड हॉफ से ही बोलनी शुरू हुई। इसके पहले नक्सली मैदानी इलाके में हाथ-पांव मार अपनी औकात समझ चुके थे। यही वो समय था जब नक्सली सरगना बीएम (िवनोद िमश्र)ने भूिमगत लड़ाई की जगह लोकतांतिरक संघषॆ की राह पकड़ी। उन्होंने छोटे-छोटे नक्सली संगठनों को जोड़ १९८० के शुरू में अाइपीएफ (इंिडयन पीपुल्स फऱंट)बनाया। पऱितबंध की खट्टी-मीठी यादों के सहारे अाजादी की सुनहरी राह पर इनका कारवां बढ़ चला।
उधर,नक्सली अांदोलन की उपजाऊ भूिम भी तैयार थी। यही कारण था िक िविनयन सरीखे नक्सली नेता भूिमगत संघषॆ पर डटे रहे। एमसीसी (माअोवादी कम्यूिनस्ट सेंटर)के नाम से बाकी बचे नक्सली संगिठत होकर मैदान की जगह इस बार जंगल-पहाड़ को अपना अाधार इलाका बनाया। नक्सली अांदोलन में यह नया मोड़ था। मदनपुर की पहािड़यों से नीचे उतर नक्सली नये तौर-तरीके के साथ जनसंघषॆ का िबगूल फूंकने लगे। मदनपुर की पहािड़यां चार िजलों गया,औरंगाबाद,पलामू और चतरा िजले का जंगली इलाका था। यहां बड़े जमींदारों की काफी जमीनें थीं, लेिकन वे खुद वहां नहीं रहते थे। खेती इलाके के गरीब-गुरबा करते थे और फसल पर कब्जा भूपितयों का होता था। इसका असंतोष तो स्थानीय लोगों में था,लेिकन इसे जािहर करने की िहम्मत नहीं थी। दूसरा मसला बीड़ी पत्ता की तुड़ाई से जुड़ा था। जंगल में हाड़ तोड़ मेहनत कर बीड़ी पत्ता तोड़ कर ठेकेदारों तक स्थानीय लोग पहुंचाते थे,लेिकन उसकी उिचत मजदूरी उन्हें नहीं िमलती थी। इन सबों से अलग असंतोष का एक बड़ा कारण अात्म सम्मान से जुड़ा था। इलाके की बहू-बेिटयां बाहर से अानेवालों की िनगाहों पर चढ़ती रहती थी। लोग चाह कर भी इसका पूरजोर िवरोध करने की िस्थित में नहीं थे।
नक्सली अांदोलन के िलए पुख्ता पृष्ठभूिम तैयार थी। हिथयारबंद नक्सिलयों ने पहला काम दूर-दराज रहनेवाले भूपितयों की जमीन पर लाल झंडा गाड़ना शुरू िकया और िवरोध करनेवाले भूपितयों के साथ बंदूक से फिरयाने लगे। बीड़ी पत्ता तुड़ाई का नया दाम बांधा गया। अाकऱोिशत स्थानीय गरीब-गुरबों के िलए नक्सली हीरो बनने लगे। िजनकी वे अब तक जी हजूरी करते थे वे अब उनके सामने िरिरयाने लगे थे। बंदूक के साये में महफूज भी थे। पुिलस जंगल-पहाड़ में अाने से बचती थी,इसिलए वह मुक्त इलाका बनने लगा। कभी पुिलस की दिबश होती तो नक्सली अामने-सामने का मुकाबला करते या िफर कमजोर पड़ने पर मदनपुर की पहािड़यों का सहारा लेकर दूसरे िजलों में घुस जाते। १९९० अाते-अाते नक्सली पहाड़-जंगल छोड़ मैदानी इलाके में भी घुसने लगे।
मैदानी इलाके में नक्सली िवस्तार पर रपट अगले अंक में पढ़े

सोमवार, 15 सितंबर 2008

दे िटप्पणी के नाम,तुझको अल्ला रखे

भाई उड़नतश्तरी हर डाल पर बैठे नजर अाते हैं
दे िटप्पणी के नाम,तुझको अल्ला रखे। हजार शब्द िलखते हैं,चार लाइना मेरे नाम िलखे। जो देता है,वह पाता है। मुझे िटप्पणी भेजे,बदले में मेरी पाये। भाई दोनों हाथ से ताली बजती है,एक हाथ मेरा-दूसरा अापका िमल जाये,तो िफर देखे कैसी गूंज होती है।हमारा ब्लॉग िफल्मों की तरह िहट हो जायेगा। चैनलों की तरह टीअारपी चढ़ जायेगी। बछड़ें की मािफक ब्लॉग का सरकुलेशन कुलांचे भरने लगेगा।िवगयापन वाले अपनी देहरी पर मत्था टेंकने लगेंगे। हमारी-अापकी बल्ले-बल्ले हो जायेगी।मेरे कई ब्लॉगर साथी इस मिहमा को पहचान गयें हैं। िमतरों-पिरिचतों से ब्लॉग देखने और िटप्पणी देने का अनुरोध िबना लजाये करते रहते हैं। वैसे ही जैसे एक िफल्म का नायक कटोरा िलए मांगता था,दे दाता के नाम....
मैं जबसे ब्लािगस्ट बना हूं,अपना देखने के अलावा दूसरों का भी देखता हूं। भाई उड़नतश्तरी हर डाल पर बैठे नजर अाते हैं।मोहतरमा शोभा जी भी उनके साथ गुटरगूं करती नजर अाती हैं। इन दोनों को ब्लािगस्टों की हौसला अफजाई के िलए पऱणाम।िटप्पणी की डाल पर इनके अलावा कुछ और नाम अक्सर टंगे िमलते हैं। यहां तक तो ठीक है,लेिकन ये शब्दों को लेकर इतने कंजूस हैं िक बधाई हो,अच्छा िलख रहे हैं,स्वागत है से ज्यादा कुछ नहीं िलखते। लगता है िक ये अालेख नहीं पढ़ते,बस जैसे ही कोई नया ब्लॉगर अाता है ये पहले से टाइप िटप्पणी उस पर िचपका देते हैं।
बहरहाल,मुझे ब्लाग पर अाये महीना से ऊपर होने को है। खेल-खेल में अा गया था। फुरसत में नाम के अपने ब्लॉग पर फुरसत में कुछ-कुछ िलखने लगा। िफट्जी से पता चला िक देश-िवदेश में लोग पढ़ रहे हैं। मैं गंभीर हो गया। जब इतने लोग पढ़ रहे हैं,तो कुछ भी िलखने से बेहतर है िक कुछ अलग िलखा जाये।इसके िलए एक नया ब्लॉग डाकघर शुरू िकया। यह िबहार-झारखंड के नक्सिलयों से जुड़ा है। बतौर पतरकार मैं इनसे जुड़ा रहा हूं और इनकी खुिबयों-खािमयों का गवाह भी रहा हूं।यही अनुभव िसलिसलेवार िलख रहा हूं।ब्लॉग फुरसत में,में मैं वैसी चीजों को शािमल करता हूं,जो पटना से जुड़ी मेरी यादों में है । वहीं नेता और अिभनेता का फकॆ िमटा देनेवाले लालू पऱसाद यादव से िविभन्न मसलों पर अॉफ दी िरकाडॆ इंटरव्यू के बहानेे वैसी चीजों पर केंदिरत हूं,जो छपने और िदखाने पर लालू जैसे अगंभीर व्यिक्त भी गंभीर हो जाये।
अब यही फुल स्टॉप लगाता हूं। इस अनुरोध के साथ िक िबना मेरे अालेख को पढ़े अापकी िटप्पणी मुझे नहीं चािहए।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

पनाह देनेवाले की बहू-बेिटयों को भी नहीं छोड़ते

माअो-लेिनन की बात करनेवाले नक्सली अाज लंपट हो गये हैं। अपने-अपने इलाके में इनके सशस्तर दस्ते गुंडा िगरोह बन गये हैं। लेवी के नाम पर इनकी गुंडई का अालम यह है िक छोटा-बड़ा कोई भी िवकास का काम िबना इनको चढ़ावा चढ़ाये शुरू नहीं हो सकता। एक िदन पहले ७४ करोड़ से बननेवाली डालटनगंज-पांकी सड़क का काम रोक िदया है नक्सिलयों ने । यह एक एेसी सड़क है,िजसे लेकर असेॆ से लोग अांदोिलत थे। बीच में लोगों ने सरकार का भरोसा छोड़ श्रमदान से सड़क िनमाॆण का बीड़ा उठाया था।
यह एक बानगी है नक्सिलयों की गुंडई की। इनकी करस्तािनयों की फेहिरश्त इतनी लंबी है िक पूरी पुस्तक बन जाये। गरीबों के िहत की बात करनेवाले ये लंपट गरीबों को कैसे सताते हैं,इसका उदाहरण इनके पऱभाव वाले इलाके के हर गांव में िमलेंगे। िजस गांव में ये रात का पड़ाव डालते हैं,वहां के लोग इनके खाने-पीने का पऱबंध तो करते ही हैं,नक्सली इनकी बहू-बेिटयों को भी नहीं छोड़ते। उनके मुगाॆ-मुगीॆ और बकरे पर तो हाथ साफ करते ही हैं।नक्सली दस्ते में एेसी कई लड़िकयां हैं,जो उनकी हवस का िशकार बनने के बाद सामािजक पऱताड़ना सहने की जगह उनलोगों के साथ ही जुड़ जाना बेहतर समझा है। पुिलस की पकड़ में अाने के बाद जब ये लड़िकयां अपनी राम कहानी सुनाती हैं,तो नक्सिलयों का असली चेहरा सामने अा जाता है।
एक अोर पूरे देश में बच्चों को स्कूल से जोड़ने का अिभयान चल रहा है,दूसरी अोर नक्सली इन बच्चों-िकशोरों को हिथयार थमा अपने दस्ते में शािमल कर रहे हैं। झारखंड के लातेहार िजला के बालूमाथ पऱखंड के कई गांव इसके गवाह हैं। यहां के िकशोरों को वजाप्ता ८०० रुपये की सैलरी दी जाती है।
नक्सिलयों के संगठन में लंपटई को लेकर कई बार गंभीर मंथन भी हुअा है,लेिकन इनका साधन ही एेसा है िक साध्य भटक जाता है। अब तो हालत यह है िक संगठन ही िबखराव के दौर में है। लेवी का भारी धन और हिथयार लेकर पूरा का पूरा दस्ता भाग रहा है। एसे लोग नक्सिलयों के अाधार इलाके में अब अपना संगठन बना वजाप्ता लेवी वसूल रहे हैं। नक्सिलयों से अामने-सामने की लड़ाई में मुकाबला कर रहे हैं। पुिलस की भूिमका भी हद तक इनकी पॐधरता की है। इसी के साथ गऱामीणों की शामत भी अा गयी है। दोनों संगठन गऱामीणों को एक-दूसरे को पनाह नहीं देने की धमकी दे रहे हैं। कई जगह इसी अारोप में गऱामीणों की िपटाई भी की गयी है। तो यह है कल के गरीबों के रहनुमा की अाज की हकीकत।

सोमवार, 8 सितंबर 2008

नक्सली इलाके में पतरकार

िवधानचंदर ने नक्सिलयों के डर से पतरकािरता छोड़ दी
नागेन्दऱ शमाॆ डेढ़ साल तक पोटा में बंद रहे
नक्सली इलाके में पतरकािरता दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। थोड़ी सी चूक से उन पर अाफत का पहाड़ टूट पड़ता है। वे कभी नक्सिलयों के िनशाने पर होते हैं,तो कभी पुिलस के। िबहार-झारखंड के ये इलाके खबर के दृिष्टकोण से काफी अहम हैं। िबहार के मगध और शाहाबाद रेज से लेकर झारखंड के उत्तरी-दिॐणी छोटानागपुर से लेकर पलामू और कोल्हान पऱमंडल में नक्सिलयों की अघोिषत सत्ता सरकार भी ना नुकुर के बावजूद स्वीकार करती है। पतरकार अखबार की जवाबदेही िनबाहते नक्सिलयों और पुिलस के बीच संतुलन साधते रहते हैं। नक्सिलयों के पऱेस बयान पतरकारों तक इस संदेश के साथ पहुंचते हैं िक जैसा िलखा है वैसा ही छपना चािहए। पतरकार खबर भी वैसे ही भेजते हैं,लेिकन संपादन में उसका हुिलया िबगड़ जाता है। बस यहीं से कस्बाई पतरकार के दुिदॆन शुरू हो जाते हैं। पलामू के पांकी पऱखंड के संवाददाता िवधानचंदर को एेसे ही हालातों में घर-पिरवार छोड़ कलकत्ता भागना पड़ा था। बीच बचाव के बाद तीन साल बाद वे घर लौटे, लेिकन दहशत एेसी की पतरकािरता से ही नाता तोड़ िलया। घर की जगह रात थाने में सोकर िबताने लगे। एेसी ही िस्थित में गढ़वा िजले के भंडिरया के संवाददाता को भी घर-पिरवार छोड़ भागना पड़ा था। हलांिक वे बाद में घर लोटे और कितपय पाबंिदयों के साथ खबर भी िलख रहे हैं।
चार साल पहले एक और एेसी ही घटना हुई। पलामू के कस्बाई पतरकार इसबार नक्सली कनेक्शन के अारोप में पोटा के तहत िगरफ्तार कर िलये गये थे। पुिलस ने उस इलाके में नक्सली सरगना दघीची राय को सािथयों सिहत मुठभेड़ में मारा था। पहाड़ की तलहटी में हुई मुठभेड़ के बाद पतरकार नागेन्दऱ शमाॆ पुिलस के हत्थे चढ़ गये। पुिलस ने मामला बनाया और पोटा में बंद कर िदया। शमाॆ नक्सिलयों के बुलाने पर अन्य पतरकारों की तरह दघीची राय के पास गये थे। उन्होंने बताया िक नक्सली सरगना दघीची राय अखबार के िलए पऱेस बयान िलख रहे थे िक पुिलस अा गयी और गोिलयां चलने लगीं। वे िकसी तरह जान बचाने में सफल रहे थे,लेिकन पुिलस ने नक्सिलयों का सहयोगी बता उन्हें पकड़ िलया। वे डेढ़ साल तक जेल में बंद रहे। उनकी िरहाई संपादक के पहल से डीजीपी के सुपरिवजन के बाद हो सकी।
पुिलस-नक्सली की इस दोधारी तलवार पर अाज भी कस्बाई पतरकार संतुलन साध संवाद संकलन और पऱेषण कर रहे हैं। अाज हालत एेसे बन गये हैंं िक संवाददाता अपनी डेट लाइन के बदले मुख्यालय के डेटलाइन से खबर छापने का अनुरोध करते हैं। उनकी डेट लाइन से खबर छपने पर सबसे पहले पुिलस उन्हें पकड़ती है। िफर शुरू होता है सवालों का अंतहीन िसलिसला। कैसे पऱेस बयान उन तक पहुंचा, कौन लाया अािद-अािद। वहीं नक्सली अपनी गितिविधयों की खबर के िलए उन पर अलग से दबाव बनाये रखते हैं। इधर कुअां-उधर खाई की इस िस्थित के बावजूद कस्बाई पतरकार अाज भी िकसी भी अखबार के मेरूदंड बने हुए हैं।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

वह नक्सली है

िपता जनतांतिरक,खुद नक्सली और बेटा पतरकार
नाम है िवजय अायाॆ। िबहार के गया िजले के गुरारू में उनका गांव है। काम भर पढ़ाई-िलखाई उसी इलाके में हुई। ९० के शुरुअाती िदन थेे। पढ़ने-िलखने के बाद भी नौकरी िमलना मुिश्कल था उन िदनों। सामान्य युवकों की तरह युवा अायाॆ भी अाकऱोिशत थे। अाकऱोश को बंदूक से व्यक्त करनेवाली पाटीॆ (गया से पलामू तक नक्सली दस्ते को पाटीॆवाला कहते हैं)एससीसी का पऱभाव छेतर गुरारू तक पहुंच चुका था। पढ़े-िलखे अायाॆ नक्सिलयों को काम के लगे। उन्हें नक्सली िलखाई-पढ़ाई के काम से जोड़ िदया गया। पऱेस नोट से लेकर पचाॆ,पोस्टर िलखने का काम अायाॆ को भाने लगा। उन्हें नक्सिलयों की फऱाॉटल संस्था जनपऱितरोध मंच का कामधाम देखने का िजम्मा िमला। पढ़ा-िलखा होने के कारण ये जल्द ही हाडॆकोर नेताअों के संपकॆ में अा गये। १९९४ में ये गया शहर से कमान संभालने लगे। यही वो समय था जब वे गया के पतरकारों के भी संपकॆ में अाये। शहर से नक्सली गितिविधयों की खबर िलखनेवालों के िलए वे नक्सली संगठन के पहले संपकॆसूतर बने।
ये ही वो शख्स थे,जो मगध छेतर में पहलीबार िपऱट और इलेक्टॉिनक मीिडया को नक्सली जनअदालत में ले गये थे। पहली बार पता चला िक अायाॆ जहां संवैधािनक व्यवस्था के िखलाफ बंदूक उठाने का िहमायती था,वहीं उसके िपता चुनाव लड़ने में िवश्वास रखते हैं। ( पूरा िववरण नक्सली जनअदालत में शीषॆक अालेख पढ़े)कुछ िदन पहले जमशेदपुर से होली मनाने रांची लौटते मेरे मोबाइल पर उनका कॉल अाया। बातें हुईं। उन्होंने बताया िक बेटा पतरकािरता कर रहा है। असेॆ बाद जेल से िनकले थे,लेिकन अाजाद नहीं थे। उन्होंने मुझे मोबाइल नहीं होने की बात कही। मेरा मोबाइल उनका लोकेशन यूपी में बता रहा था। पहचान छुपाने के िलए वे पिब्लक बूथ से बात कर रहे थे। बेटा अाजाद है। अलग बात है िक िपता नक्सली है। उगऱवादी गितिविधयों से अलग उसकी अपनी पहचान है।
बहरहाल,जब मैंने उनसे नक्सली गितिविधयों के संबंध में टोह ली,तो उन्होंने बताया िक झारखंड में जीतन मरांडी सशस्तर जनसेना की कमान संभाल रहे हैं। वे खुद िबहार-झारखंड में उसके ऊपरी संगठन की िजम्मेवारी देख रहे हैं।
जीतन मरांडी कौन है,मैं नहीं जानता।बस इतना जानता हूं िक जीतन मरांडी नाम झारखंड पुिलस को भी परेशान कर रही है।कुछ माह पहले पुिलस ने जीतन मरांडी को पकड़ा भी। खोज-बीन से पता चला िक वह जनवादी िवचारधारा का है और किव भी है। किव एेसा िक िमनटों में किवता गढ दे। साउथ छोटानागपुर की अांचिलक भाषा का जानकार है। उसके दो अालेख एक पऱितिष्ठत दैिनक के पहले पन्ने पर छपे थे।अंततः दिरयाफ्त कर पुिलस को उसे छोड़ना पड़ा। इसमें रांची के कऱाइम िरपोटॆरों की खबरों ने भी अहम भूिमका िनभायी।
अगली डाक पढ़े-नक्सली छेतर में पतरकािरता

बुधवार, 3 सितंबर 2008

गोिलयों की बौछार के बीच मैं और संपादक

िसर से पांव तक धूल-धूसिरत थे हम
कभी भी हो सकता था बारूदी सुरंग िवस्फोट
हम पहली बार पुिलस-नक्सली मुठभेड़ में िघरे थे। साथ में थे िहन्दुस्तान रांची के हमारे संपादक हिरनारायण िसंह। अंधेरी रात में गोिलयों की तडतड़ाहट और दोनों अोर से ललकारने की अवाजे थीं। सुरच्छा बलों ने जब नाइट िवजन रायफल चलाया,तो पता चला िक हमलोग जहां-तहां िबखरे हुए हैं। सरक कर मैं अपने संपादक के पास गया।िसर से पांव तक हम धूल-धूसिरत थे। उन्होंने पूछा,डर तो नहीं लग रहा?
यह १२ फरवरी २००१की घटना थी। झारखंड के पलामू िजले के बालूमाथ जंगल में पुिलस ने नक्सिलयों के दो बंकर खोजे थे। वहां से हिथयार और नगदी पुिलस को हाथ लगे थे। १२ फरवरी को पुिलस बंकर को िवस्फोट कर ध्वस्त करनेवाली थी। ११ फरवरी की अाधी रात को हमारे संपादक ने कहा िक नक्सल पऱभािवत झारखंड में पुिलस की यह बड़ी सफलता है,इसका अच्छा कवरेज होना चािहए। हम दोनों अाधी रात को ही िनकल िलये। सुबह चंदवा पहुंचे और दस बजे सुबह मैं संपादक के साथ बालूमाथ थाना में था। पलामू के तत्कालीन एसपी अिनल पालटा और िजलािधकारी पऱदीप कुमार के नेतृत्व में भारी पुिलस व्यवस्था के बीच हमलोग बंकर की अोर बढ़े। १० िकलोमीटर जाने के बाद गािड़यों का हमारा कािफला ठहरा।यहां हमें बताया गया िक अागे की १० िकलोमीटर की राह पहाड़-जंगल से गुजरते पैदल तय करनी होगी। बालूमाथ का लैंडस्केप अद्भुत था। एसपी पालटा ने कहा,अागे और सुहावने नजारे िदखेंगे। हम सभी कतार में िगरते-पड़ते अागे बढ़ रहे थे। बीच-बीच में गांव िमलते, लेिकन सुनसान। पता चला िक पुिलस की गितिविध बढ़ने से लोग भय से पलायन कर गये हैं। दोपहर बाद हम सभी नक्सिलयों के बंकर के पास थे। बंकर दो पहािड़यों के बीच तराई में िस्थत नदी के िकनारे था। वह ईंट-कंकऱीट से बना दो कमरे की गुफा थी। पऱवेश द्वार झाड़-झखाड़ से बंद था। बंकर की छत पर घास उगे थे। दूसरा बंकर वहां से १०० मीटर दूर था। सीसीएल के एक्सप्लोिसव एक्सपटॆ बंकरों को उड़ाने के िलए भारी मातरा में बारूद लाये थे। बंकरों में उसे लगाया गया। २०० मीटर दूर से बारी-बारी से दोनों बंकरों में िवस्फोट िकया गया। कान के पदाॆ को िहलानेवाली अावाज हुई और धूल-धक्कड़ का गुब्बार उठा। १० िमनट तक िदन में रात जैसी िस्थित बनी रही। अबतक शाम िघरने लगी थी। वहां से िनकलते-िनकलते अंधेरा भी छाने लगा। हमलोग अपनी गािड़यों तक पहुंचे और चले। २०० मीटर अागे बढ़ते ही हमारी अोर लच्छय कर गोिलयां दागी जाने लगी। अचानक हुए इस हमले से हमारी गािड़यों के बऱेक लग गये। एसपी पालटा ने हमें जमीन पर लेट जाने को कहा। लगभग १० िमनट दोनों अोर से गोिलयां चलीं। एक दूसरे को ललकारा गया,गिरयाया गया। कुछ देर बाद िस्थित सामान्य होने पर हम िफर अागे बढ़े। जंगल की उबड़-खाबड़ पथरीली सड़क पर हम एक िकलोमीटर अागे बढ़े होंगे िक एक बार िफर गोिलयां चलने लगीं। इस बार हम पर दोतरफा फायिरंग की जा रही थी। हम उस जीप में बैठे थे,िजसमें िवस्फोट के बाद के बाद बची बारूद के बैग रखे गये थे। लगा कहीं बारूद में िवस्फोट न हो जाये। िपछली बार की तरह हम एक बार िफर गाड़ी से कूद जमीन पर पसर गये थे। यहां अाधे घंटे तक मुठभेड़ चली। नक्सली तब भागे,जब पुिलस ने एचइ बम दागा। अबतक रात के दस बज चुके थे। हमारा कािफला एक बार िफर अागे बढ़ा। अब नक्सिलयों की गोली से ज्यादा उनके बारूदी सुरंग िवस्फोट का खतरा था। यह हादसा कभी भी हो सकता था और यह सोच-सोच कर हम रामनाम जप रहे थे। भूखे-प्यासे रात एक बजे हम रांची पहुंचे और िपल पड़े अखबार में छपने के िलए एक्सक्लूिसव िरपोटॆ िलखने।

नक्सली सुपऱीमों

१९९५ की गिमॆयों की बात है। बतौर िरपोटॆर गया में था। बहुचिचॆत बारा नरसंहार(११ फरवरी १९९२ की रात एक ही जाित भूिमहार के ४० लोगों को नक्सिलयों ने काट डाला था)के बाद नक्सली हौवा बन चुके थे। लगातार नक्सली घटनाअों की िरपोिटॆंग करने के बाद भी कभी नक्सिलयों से मुलाकात नहीं हुई थी। ना ही हमें उनके संगठन के संबंध में कुछ िवशेष पता था। िसफॆ उनके बाहरी संगठन जनपऱितरोध मंच के कताॆ-धताॆअों से संपकॆ था। वे भूिमगत संगठन एमसीसी के पऱेस बयान हम तक पहुंचाते थे। गया में मैं और वहां के दैिनक िहन्दुस्तान के संवाददाता िवजय नारायण (िफलहाल जागरण अागरा के संपादक)और दैिनक अाज के संवाददाता िवषणुकांत िमश्र एक साथ एक होटल के अलग-अलग कमरों में रहते थे। हम तीनों ने अपने संपकोॆं के माध्यम से एमसीसी के सुपऱीमों सागर चटजीॆ उफॆ िशबू दा से िमलने के िलए हाथ-पैर मारना शुरू िकया। एमसीसी के फऱॉटल संगठन जनपऱितरोध मंच के कताॆ-धताॆ िवजय अायाॆ ने हमें नक्सली सुपऱीमों से िमलवाने का अाश्वासन िदया। समय गुजरता गया। बात अायी-गयी सी हो गयी। इसी दौरान जून माह की एक सुबह उन्होंने तैयार रहने का संदेश िभजवाया। शाम में उनके एक पऱितिनिध के साथ हमलोग गया के गुरारू पहुंचे। िफर वहां से िवजय अायाॆ के गांव। अाधी रात को एक-एक कर बंदूक थामे लोग वहां जुटने लगे। हम सभी सत्तू घोलकर पीये और नक्सली सुपऱीमों से िमलने की उत्सुकता से इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद वहां एक और नक्सली दस्ता पहुंचा। उसने जानकारी दी की अाज मुलाकात नहीं हो पायेगी। कारण बताया गया िक कुछ पुिलस मूवमेंट की जानकारी िमली है। हमलोग रात वहीं िबताये और सुबह में गया लौट अाये। चार िदन बाद एक बार िफर मैसेज िमला िक तैयार रहें। एकबार िफर हमलोग िवजय अायाॆ के गांव पहुंचे और इंतजार करने लगे।

एेसे पहुंचा नक्सली सुपऱीमों तक

िपछली बार की तरह नक्सिलयों का हिथयारबंद दस्ता रात ११ बजे अाया और हम सत्तू पीकर उनके साथ हो िलये। अायाॆ ने बताया िक चार-पांच घंटे पैदल चलना होगा। यह सुन िवजय नारायण ने अायाॆ से कहा-िसफॆ सत्तू पीकर संजय नहीं चल पायेंगे। कुछ खाने को ले लें। गमछा में रोटी,प्याज और िमचॆ बांध घनघोर काली रात में हमारी यातरा शुरू हुई। नक्सली दस्ते ने हमें एक कतार में अागे-पीछे कर लाइन बना िदया था इस चेतावनी के साथ िक कोई बातचीत नहीं करेगा। मािचस-टाचॆ नहीं जलाये जायेंगे। दो-तीन िकलोमीटर जाने के बाद एक हिथयारबंद नक्सली बगल से दौड़ता हुअा,मदन िशकारी एक-मदन िशकारी एक दुहराता िनकला। िवजय अायाॆ ने बताया िक मदन िशकारी एक अाज का हमारा कोड वडॆ है। इसी से दोस्त-दुश्मन की पहचान होगी। उन्होंने इसे याद रखने की िहदायत दी। कुछ दूर जाने के बाद हम एक गांव के पास पहुंचे। वहां हमें रुकने को कहा गया। नक्सिलयों ने िसयार की अावाज िनकाली। गांव की ्ोर से भी वही अावाज अायी। थोड़ी देर बाद २०-२५ लोग हमारे कािफले में शािमल हो गये। यह िसलिसला चार-पांच गांवों के करीब चला,लोग जुड़ते गये और कारवां बढ़ता रहा। खेतों की पगडंिडयों पर लुढ़कते-उठते,नदी-नालों को पार करते,जंगल-पहाड़ की कटीली-पथरीली मागोॆ से गुजरते कारवां एक सूखे अाहर पर पहुंचा। हमें वहां रोक िदया गया। एक अावाज िनकाली गयी। दूसरी अोर से भी वही अावाज अायी। थोड़ी देर बाद कुछ हिथयारबंद लोग अाये और रास्ता साफ होने का संदेश िमलने पर िफर कारवां चल पड़ा। एक-एक िकलोमीटर के फासले पर हमें इसी तरह रोक कर तीन बार पऱिकऱया दुहरायी गयी। नक्सली िवजय अायाॆ ने बताया िक तीन स्तरीय सुरच्छा होती है हमारी। सुपऱीमों तक पहुंचने के पहले दुशमनों (पुिलस)को रोकने के िलए एेसा िकया जाता है। अंततः हम नक्सली सुपऱीमों सागर चटजीॆ के सामने थे। रात के ढाई बज रहे थे।
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